वृक्ष संरक्षण - कविता - राम प्रसाद आर्य

वृक्ष से मिलती हवा है साँस लेने के लिए हमको सदा। 
मधुर रसमय फल व शीतल छाँव, थक जायें यदा।। 

वृक्ष देते जल हमें, ईंधन जलाऊ, इमारत के काठ अनेक। 
वृक्ष पत्तों से हरित चारा पशुओं का और औषधियां अनेक।। 

फिर भी क्यों वृक्षों का रक्षण छोड़, क्षति करते हैं हम? 
वृक्ष हैं तब है ये जीवन, जानकर भी ध्यान नहीं धरते हैं हम।। 

सोचते हैं वृक्ष जड़ है, पर असल में हम ही जड़ हैं। 
समझते नहिं वृक्ष पर निर्भर चराचर जीव-जीवन, श्रृष्टि औ पर्यावरण है।। 

वृक्ष तल आनन्द औ एकाग्रता, तप-ध्यान का स्थान है। 
कल्प, वट, पीपल, अनेकों दृष्टांत विद्यमान हैं।। 

न केवल विज्ञान, पर निज ज्ञान का भी तनिक जो उपयोग हो। 
क्यों प्रदूषित प्रकृति हो, औ क्यों कोरोना सा संक्रामक असाध्य कोई रोग हो।।

वृक्ष-संरक्षण जरूरी है, अगर ये मान लें मन ठान लें। 
आ न सकती आपदा कोई सुरक्षित हर जीव, जन, पर्यावरण, ये मान लें।। 

वृक्ष पातन से बड़ा नहिं कोई भी अपराध, भ्रष्टाचार है। 
न केवल एक वृक्ष, सारी श्रृष्टि पर यह घोर अत्याचार है।। 

बृक्ष पातक को भले कानून जग कोई सजा ना दे, ये मान लें। 
किन्तु कुदरत के कटुक कानून से वो बच नहीं पायेगा, ये भी जान लें।।

राम प्रसाद आर्य - जनपद, चम्पावत (उत्तराखण्ड)

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