और मैं कहता हूँ, मेरे माता-पिता का नूर है!
उन्हीं की दुआओं से चमकते हैं सितारे मेरे,
वरना मुझ नाचीज़ को कहां इतना शऊर है?
माता-पिता से बढ़कर कुछ हो नहीं सकता,
ख़ुदा भी इनकी नेकियों के आगे कमज़ोर है!
और अगर मैं चाहूँ तो भी हार सकता नहीं,
क्योंकि मेरे माँ-बाप की रहमतों का ज़ोर है!
सो जाता हूँ मैं आज भी उनके आंचल तले,
ख़ुद ही गुज़र जाता है, मुसीबतों का दौर है!
माता-पिता औलाद को कभी बद्दुआ देते नहीं,
जिस दिन वो रो दिये, समझना तेरा कसूर है!
कभी अपने माता-पिता का दिल दुखाना मत,
क्योंकि इनके सदके हमारी हस्तियां मशहूर हैं!
कपिलदेव आर्य - मण्डावा कस्बा, झुंझणूं (राजस्थान)