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चौराहे पर बिखरा हुआ प्रेम - कहानी - डॉ॰ धनंजय कुमार मिश्र
शहर का वह चौराहा बड़ा बदनाम था। दिन में वहाँ इतनी भीड़ रहती कि आदमी आदमी को पहचान न सके और रात में इतनी ख़ामोशी उतर आती कि किसी अकेले आ…
कैसे तुम्हें बुलाता भला? - कविता - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
शब्द तुम, छन्द तुम, गीत और राग तुम बेसुध-सा आलाप ले-ले मैं तुम्हें गाता रहा कभी तो समझोगी मेरे निर्मल मनोभावों को बस अपने मन को यही मै…
स्वार्थ - कहानी - डॉ॰ धनंजय कुमार मिश्र
मिहिजाम एक अजीब क़स्बा था। न पूरी तरह शहर, न पूरा गाँव। सुबह मंदिरों की घंटियों से खुलती, दोपहर में चित्तरंजन की फैक्ट्री संस्कृति का …
अंकुरण फिर लौट आए - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे अश्रु दल जब, अंजुरी को भेद पाए। अंकुरण फिर लौट आए। हो गया आँगन सहर्षित, आश्रुओं ने जीत देखी। पल्लवों के स्वप्न जागे, …
प्रेम दया विश्वास से, विजयी हो संसार - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
प्रेम दया विश्वास से, सुंदर घर निर्माण। कटु वाणी से टूटकर, बिखरे ख़ुशियाँ प्राण॥ बचपन की मुस्कान से, महके गली सुहात। मिल-जुल कर जब लोग …
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