ब्रज माधव - हटिया, राँची (झारखण्ड)
यादें - कविता - ब्रज माधव
मंगलवार, अक्टूबर 17, 2023
ऊँची आलमारी पर रखी
कोई धूल में लिपटी किताब
उसके फटे पन्ने की
अधूरी कहानियों को
कोरे काग़ज़ पर
एकाकी गुनगुनाते किसी याद से
जन्म लेती है कोई कविता।
गरम थपेड़ों से थकी-थकी
बार-बार गिरते तिनकों से
चिड़िया जब बनाती है घोंसला
जब चहकता है उसमें एक परवाज़
भविष्य का
तो उस अभिमानी हौसले से
जन्म लेती है कोई कविता।
कोई पल मुलायम
जिसकी छुअन
कौंधा देती हैं बिजलियाँ
दिल-ओ-दिमाग़ में,
कोई कठोर
खुरदरापन जिसका छील देता है
अंतर्मन को
इन उबर खाबड़ पलों में भी
जन्म लेती है कोई कविता।
और मैं कह रहा था
कि अगर मैं कठोर न होता
तो जन्म न देता
इतनी काली कविताओं को।
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