चौखम्बा - कविता - मोहित नेगी 'मुंतज़िर'

चौखम्बा - कविता - मोहित नेगी 'मुंतज़िर' | Hindi Kavita - Chaukhamba  - Mohit Negi Muntazir
वे 
तब निकलती हैं
घास के लिए
जंगलों को,
जब उन्हें दिखने लगती है
चौखम्बा के शिखरों पर
सुनहरी रौशनी।
वे करती रहती हैं काम
और निहारती रहती हैं
बीच-बीच में
चौखम्बा के उतंग शिखर।

उन्होंने भैंस दुह दी है
धारे से पानी लाकर
वे रख चुकी हैं
गागर, आँगन में एक ओर
लाल मिट्टी से चौका
पोत दिया है।
घर के बुज़ुर्गों को दे दी है पहली चाय
लेकिन अभी तक नहीं दिखी
चौखम्बा के शिखरों पर
सुनहरी रौशनी।

रौशनी दिखते ही
वे निकल पड़ीं हैं
जंगलों की और
लगता है उन्हें भी किसी जन्म में
हुआ है वनवास
जिसे भोग रही हैं वे
किश्तों में
हर दिन

शाम को वे जब
काम कर रही 
होती हैं
खेतों में
तो निहारती हैं चौखम्बा।

उसके शिखरों पर बचे हुई
आख़िरी
सुनहरी रौशनी
के क़तरे
उन्हें इशारा करते हैं
घर जाने का। 

मोहित नेगी 'मुंतज़िर' - सौंराखाल, रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)

Instagram पर जुड़ें



साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos