मेरे और तुम्हारे सपनें - ग़ज़ल - ममता शर्मा 'अंचल'

मेरे और तुम्हारे सपनें - ग़ज़ल - ममता शर्मा 'अंचल' | Ghazal - Mere Aur Tumhaare Sapnein. प्रेम पर ग़ज़ल, Love Ghazal
मेरे और तुम्हारे सपनें,
कितने प्यारे-प्यारे सपनें।

हम दोनों ने रंग भरे हैं,
अजब अनोखे न्यारे सपनें।

इन पलकों पर ही सोते हैं,
आँखों के हैं तारे सपनें।

छल औ' कपट नहीं आता है,
सच में बड़े दुलारे सपनें।

अब तो रह गए मन के हो कर,
पहले थे बनजारे सपनें।

इनके अंदर सभी स्वाद हैं,
मीठे तीखे खारे सपनें।

ख़ुशबू-फूल बहुत मन भाते,
खेले हैं अंगारे सपनें।

कभी धूप बनते वसंत की,
बनें कभी बौछारें सपनें।

पल-पल रंग बिखेरा करते,
रहकर साथ हमारे सपनें।


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