साई अनमोल - अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
तुम भोगी अश्रु के - कविता - साई अनमोल
शुक्रवार, मई 08, 2026
धूलि में अम्बर कल्पित
कण में काया का मोल,
भिक्षुक से इस जीवन में
अश्रु अपने अनमोल!
इनमें जीवन प्रतिबिम्बित
इनसे क्यों खेलो खेल?
खारेपन में पाते हो
क्या मधुता का मेल?
युग-युग यह अविरलता
आँसू में आता स्वाद,
कब तक मैं इन्हें पिलाऊँ,
हे! कैसा यह उन्माद?
अश्रु की मुक्तावलियाँ
आ कंठ तेरे पहनाऊँ,
तुम भोगी हो अश्रु के
आओ मैं भोग लगाऊँ!
तेरा रोम-रोम भिगाऊँ!
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