यदि सहिष्णुता नहीं आपमें - मुक्तक - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'

यदि सहिष्णुता नहीं आपमें - मुक्तक - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' | Muktak - Yadi Sahishnuta Nahin Aapme
यदि सहिष्णुता नहीं आपमें आह! कमी यह भारी।
प्रभु की दया कृपा से ही तो यह चलती जगती सारी।
यह भ्रम कैसे, गर्व कहाँ से अवगुण बड़ा 'अंशुमाली'?–
दोष त्याग दो, बड़ा कठिन है, कैसे जीतोगे पारी? 

शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' - फ़तेहपुर (उत्तर प्रदेश)

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