आदमी टूट जाता है - कविता - प्रवीन 'पथिक'

आदमी टूट जाता है - कविता - प्रवीन 'पथिक' | Hindi Kavita - Aadmi Tut Jata Hai - Praveen Pathik
बहुत कुछ टूट जाता है,
छूट जाता है;
जब आदमी
ख़ुद से रूठ जाता है।
एक खालीपन से,
उसका जीवन भर जाता है।
जब वह खो जाता है, 
किसी का हो जाता है;
प्यारे सपने लिए,
वह सो जाता है।
भ्रम टूटता है,
जहाँ से वह लूटता है।
बचता तो कुछ भी नहीं,
जब सब कुछ उससे छूटता है। 
तब ऑंखे खुलती है,
सत्य से मिलती है।
पर्दा ऑंखो से हटता है,
भ्रम का बादल छटता है।
तब मिलती शांति है,
मन की झिलती भ्राँति है।


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