डॉ॰ पीताम्बरी - ब्यावर (राजस्थान)
बहू का घूँघट - कहानी - डॉ॰ पीताम्बरी
गुरुवार, अप्रैल 30, 2026
कार की पीछे वाली सीट पर घूँघट डाले, सर झुकाए बैठी अमिता सिसकियाँ ले रही थी। पिता के घर से विदा हुए उसे घंटे भर से ज़्यादा हो चुका था, लेकिन घर वालों की याद और अनजान लोगों के बीच जाने का डर उसे सताए जा रहा था। उसके मन में ससुराल को लेकर कई विचार आ जा रहे थे। पास ही में बैठे उसके पति राकेश उसे लगातार चुप हो जाने के लिए कह रहे थे। कार राकेश की मामी चला रहीं थी और पास वाली सीट पर मामा जी बैठे थे। दोनों ही ख़ुशमिज़ाज और खुले विचारों के थे। लगभग आधा रास्ता पार कर चुके थे। कार में थोड़ी देर की चुप्पी के बाद एक नई बहस ने जन्म ले लिया था। मामी कमला देवी बोली “राकेश..! क्या सोचा है… बहू से पर्दा करवाएगा या नहीं?”
“अब मैं क्या ही बताऊँ मामी जी… जैसा आप लोग कहे… आप बड़े हैं, आप ही बता दीजिए।” राकेश दबे स्वर में बोला।
“अरे..! ये क्या कह रहे हो तुम… ये तो बहु की मर्ज़ी पर निर्भर करता है। तुम उससे पूछो…।” कमला देवी से मिरर से पीछे देखते हुए कहा।
“बोलो राकेश… क्या हुआ… तुम दोनों चुप क्यों हो? क्या हमारी बात सही नहीं लगी?” कमला देवी ने फिर से प्रश्न किया।
ये चर्चा सुनकर अमिता असमंजस के साथ राकेश को देख रही थी, जैसे पूछ रही हो कि वह क्या जवाब दे। वह धीरे से राकेश से बोली “आप ही बताइए न कि मुझे क्या करना चाहिए? घूँघट करना चाहिए या नहीं?” अमिता ने गेंद अब राकेश के पाले में डाल दी थी।
“लो भई… अब तो तुम्ही निर्णय करो राकेश कि क्या करना है? जल्दी निर्णय करो गाँव आने वाला है।” कमला देवी बोलीं।
“मामा जी आप ही बताइए न कि क्या किया जाए?” राकेश ने अरुण से पूछा, जो काफ़ी समय से चुप बैठे थे।
“अरे यार… मुझे क्यों घसीटते हो, इन सब में। मेरे विचार थोड़े अलग हैं, शायद तुम लोगों को पसंद न आए?” अरुण ने कमला की तरफ़ इस तरह से देखा जैसे कह रहे हो कि सबसे पहले तुम्ही मेरे विचारों के ख़िलाफ़ बोलोगी।
“बोलो भी… हमें भी तो आपके विचारों से अवगत होने का सुअवसर प्राप्त होना चाहिए।“ कमला ने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा।
“मुझे लगता है कि बहू को कुछ दिन गाँव की परंपराओं का निर्वहन पूरे मन से कर लेना चाहिए। यहाँ एकदम से अगर कोई नई बहू घूँघट न करे तो न जाने सभी क्या समझेंगे। हाँ… समय के साथ धीरे-धीरे बहू चाहे तो घूँघट हटा सकती है। अभी एकदम हटाना… शायद सभी घर वालों को पसंद न आए।” अरुण ने अपनी राय रखते हुए कहा।
“वाह..! वाह..! क्या बात है!... देखो तो क्या उच्च कोटि के विचार हैं महाशय के। एक बात बताओ… क्या तुम घूँघट निकालकर घर के सारे काम कर सकते हो? खाना बना सकते हो? बोलो…। एक काम करो तुम ही घूँघट निकाल लो,… बहू क्यों करे घूँघट?” कमला देवी आवेश में बोलती जा रही थी। उन्हें अरुण के विचार कतई पसंद नहीं आ रहे थे।
“बस करो मेरी माँ, मैंने तो केवल अपने विचार रखे थे। तुमने तो दाना पानी लेकर मुझ पर चढ़ाई ही कर दी। मैं अब कुछ नहीं बोलूँगा।” अरुण ने कमला देवी के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा।
“हाँ तुम तो चुप ही रहो… राकेश तुम बोलो… तुम्हारी क्या राय है? जल्दी निर्णय लो, गाँव आने ही वाला है।”
“मामी जी… मैं क्या ही बोलूँ…. जो इन्हें उचित लगे… वो कर लें… लेकिन मामा जी भी ग़लत नहीं है।”
“ये तुम कह रहे हो राकेश..! एक पढ़ा लिखा नौजवान इस तरह की बातें कर सकता है, मैंने सोचा नहीं था। मुझे तुम से तो ये अपेक्षा नहीं थी। तुम्हारे मामाजी का तो एकबारगी मै समझ सकती हूँ, लेकिन तुम भी…।” कमला देवी के स्वर में आश्चर्य के साथ साथ निराशा का पुट साफ़ झलक रहा था। उधर अमिता की स्थिति और ख़राब होती जा रही थी। एक तो घर वालों से बिछड़ने का ग़म, ससुराल में नए लोगों के बीच रहने का डर और अब ये…। उसे घूँघट करना चाहिए या नहीं, उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। उसने एक बार प्रश्नवाचक नज़रों से राकेश की तरफ़ देखा और धीरे से बोली“ सुनिए… अब मुझे क्या करना है… बताइए तो।”
“जैसा तुम्हें उचित लगे, वैसा ही करो।” राकेश ने मुस्कुराकर कहा।
मुझे ऐसा नहीं लगता। तो फिर क्या करूँ….. अपने दिल की बात सुनूँ या परिवार की ख़ुशी?” अमिता ने मन ही मन सोचते हुए अब अपना सर पकड़ लिया था। उसे अब कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। एक बार फिर से उसने राकेश की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देखा कि शायद वह ही कुछ मदद कर दे। राकेश ने इशारों में पूछा कि क्या हुआ। अमिता ने भी इशारों में ही विनती करते हुए कहा कि प्लीज़ मदद कर दो। राकेश ने जब मुस्कुराकर कहा, “जैसा तुम्हें उचित लगे, वैसा ही करो,” तो अमिता को महसूस हुआ कि यह केवल उसे आज़ादी देना नहीं, बल्कि एक भारी ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर डाल देना था। कार गाँव की सीमा में दाखिल हो रही थी। दूर से ढोल-नगाड़ों की आवाज़ सुनाई देने लगी थी।
अमिता ने एक गहरी साँस ली। उसने अपना घूँघट ठीक करने के बजाय उसे पूरी तरह चेहरे से हटा दिया और सीधे बैठकर कमला मामी की आँखों में देखा।
“मामी जी,” अमिता की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, “मामा जी अपनी जगह सही हैं कि समाज क्या कहेगा, और आप अपनी जगह सही हैं कि यह मेरी आज़ादी का सवाल है। लेकिन अगर आज मैंने डर कर आधा घूँघट किया, तो वह आधा पर्दा मेरी पूरी ज़िन्दगी की पहचान बन जाएगा।”
मामा जी और राकेश चौंक कर उसे देखने लगे।
अमिता ने राकेश का हाथ धीरे से थामा और कहा, “राकेश, आपने कहा कि मैं जो चाहूँ वो करूँ। तो मेरा फ़ैसला यह है कि मैं घूँघट नहीं करूँगी। मैं चाहती हूँ कि आपके माता-पिता मुझे एक ‘बहू’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘बेटी’ के रूप में स्वीकार करें। और बेटी से कोई पर्दा नहीं करता। अगर मैं आज छिप गई, तो मैं कभी उनके क़रीब नहीं आ पाऊँगी।”
कार घर के सामने रुकी। बाहर औरतों का हुजूम खड़ा था, सबके हाथों में आरती की थालियाँ थीं और सबकी नज़रें कार के दरवाज़े पर टिकी थीं।
कमला मामी के चेहरे पर एक गर्व भरी मुस्कान थी। उन्होंने धीरे से कहा, “शाबाश अमिता! अपनी पहचान की चाबी किसी और के हाथ में मत देना।”
जैसे ही कार का दरवाज़ा खुला, अमिता आत्मविश्वास के साथ बाहर निकली—बिना किसी घूँघट के, सिर ऊँचा किए। शुरू में कुछ पल के लिए वहाँ सन्नाटा पसर गया। गाँव की कुछ बड़ी-बूढ़ी औरतों के चेहरे पर हैरानी थी, लेकिन अमिता ने आगे बढ़कर सबसे पहले अपनी सास के पैर छुए और उनके गले लग गई।
उसकी सादगी और निश्छल मुस्कान ने उस ‘पर्दे’ की दीवार को गिरा दिया जिसे समाज सदियों से खड़ा किए हुए था। राकेश ने भी अमिता के पास खड़े होकर मुस्कुराते हुए अपनी माँ को देखा, जैसे कह रहा हो— “देखिए, आपकी बहू नहीं, आपकी बेटी आई है।”
परंपरा हार गई थी, और एक नया रिश्ता जीत गया था।
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