साई अनमोल - अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
ओ प्यारे मेरे! आँखें खोल! - कविता - साई अनमोल
शनिवार, मार्च 21, 2026
मैं दीपक तो तुम लौ बन जाना
पवमान चतुर तुमको ले लेगी?
ना.. ना.. तुम मुझमें ही समाना;
अरे प्यारे अब तो जाग ज़रा!
दृष्टि कुछ मुझपे डाल ज़रा!
कब तक तुझको ये रचती रहेगी–
यह क़लम मेरी-तुझ सी अनमोल!
ओ प्यारे मेरे! आँखें खोल!
मैं काली पट्टी बन जाऊँ
तो रम्य चक्षु तुम बन जाना
अब ढूँढ़ना क्या, छोड़ो उसको
तुम मुझसे ही चिपटे रहना!
कोई नहीं हो तरफ़ हमारे
होंगे हम दोनों ज्यों 'न्यारे'
यह पल हाय! कितना अनमोल!
ओ प्यारे मेरे! आँखें खोल!
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