चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव - प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)
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माँ भाषा हिंदी - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव | हिन्दी दिवस पर कविता
माँ भाषा हिंदी - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव | हिन्दी दिवस पर कविता
शनिवार, सितंबर 14, 2024
हिंदी है वो ममता की छाँव,
जो हर दिल में बसती है,
आँगन की वो मीठी बोली,
जो होठों पर सजती है।
गंगा सी निर्मल, सरल,
हर पग में अपनापन,
संस्कृति की ये बूँदें हैं,
जिनसे सींचा है बचपन।
ताजमहल की नक़्क़ाशी में,
या गीतों की सुरमाई धुन,
हर शब्द में बसी है हिंदी,
हर दिल से कहती सुन।
रोटी सी सरल है ये,
माटी सी इसमें ख़ुशबू है,
माँ की लोरी जैसी है,
दिल को सुकून की धुन है।
इसको जब भी कोई भूले,
जड़ें हिल सी जाती हैं,
हिंदी है आत्मा भारत की,
इससे ही पहचानें जाती हैं।
आओ फिर से गर्व करें,
इस अमृतमयी भाषा पर,
हिंदी दिवस का ये पर्व,
समर्पण हो इस भाषा पर।
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