ऐ बादल! - कविता - नूर फातिमा खातून 'नूरी'

तपती धरती पर तरस खाओ ना,
ऐ बादल! अब तो बरस जाओ ना।

सूख रहें हैं सारे खेत खलिहान,
है भीषण गर्मी शाम चाहे बिहान।
पशु-पक्षी प्यासे फड़फड़ा रहे हैं,
आदमी तर-तर पसीना बहा रहे हैं।

ऐ मेंढक! जोर-जोर टरटराओ ना,
ऐ बादल! अब तो बरस जाओ ना।

सूख रहे सब नदी-नाले,तालाब,
मछलियाँ तड़पने लगी बिन आब।
सड़कें, गलियाँ सब सुनसान हुए,
नवजात शिशु गर्मी से परेशान हुए।

ऐ हिमालय! ज़रा उसे समझाओ ना,
ऐ बादल! अब तो बरस जाओ ना।

कण-कण धूल बन बिखर रहे हैं,
हवाएँ, फ़िज़ाएँ भी बिफर रहें हैं।
उतरा सा लगता फूलों का रंगत,
आकाश में ना दिखे बगुलों का संगत।

ऐ पपीहा! उसे जल्दी बुलाओ ना,
ऐ बादल! अब तो बरस जाओ ना।

नूर फातिमा खातून 'नूरी' - कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)

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