जीवन: एक युद्ध - कविता - सिद्धार्थ शुक्ला

था वो कहने की शबर में हार जाऊँगा मैं एक दिन
हार जाऊँगा मैं एक दिन था वो कहने की फ़िक्र में, 
यूँ दब दबी आवाज़ में स्वर कहीं उदघोष का 
और सुनाई दे रहा था स्वर कहीं प्रतिरोध का 
वक्त के बाजू में जकड़े पैर मेरे सुन पड़े थे 
चल रहा था बस लक्ष्य की ओर 
क्योंकि मेरे सपने मेरी औक़ात से बड़े थे
युद्ध में तो आ गया था युद्ध कौशल के बिना 
और अकेले लड़ रहा था शत्रु को देखे बिना 
असैयम, अकर्म, अप्रतीक की छाया पड़ी थी 
इसीलिए शायद मेरी मंज़िल मुझ से कोसों दूर खड़ी थी
हारते वो फ़ैसले और टूटते वो हौसले 
हर पल वह मुझसे कह रहे थे
फ़ैसलों ने बदली है दुनिया हौसलों ने जीती है दुनिया
कर अटल विश्वास तू हो जा खड़ा मैदान में, 
और दिखा दे रण में आकर योद्धा नहीं तेरे समान में 
थे उठ रहे मन में मेरे वो हार के विचार थे 
थे कट चुके बाजू मेरे पर जीत के आसार थे
था अकेला जूझता मैं युद्ध में अब भी खड़ा था 
और जान बाक़ी पड़ी थी यकीं मानो मैं अंत तक लड़ा था 
मानो यकीं मैं जीता उसी दिन 
जब स्वर उसी की उसके परे थे 
गैर की महफ़िल में उठते हर जगह चर्चे मेरे थे
वक्त के प्रतिरोध की क्षमता भी यूँ कुछ घट गई 
जब सामने मेरे, मेरी ही मंज़िल झुक गई
वक्त की चाबी के घूमी सारे ही ताले खुल गए 
अपनों को तो बस गिनता रहा वे सारे अपने हो गए 
शाम-ओ-सुबह आठों पहर बस ज़िक्र मेरा ही कर रहे थे 
देख कर यह सब, मुझे ना समझने वाले भी समझ रहे थे
सोचता हूँ दुनिया का अलम् अजीब है
वक्त की रंजिश मे ठहरा दौर तो बस नफ़रत का है
वक्त की भाषा तो समझें, है मुझे ये मुश्तज़र 
यह कभी इधर तो कभी उधर 
यह पल में शून्य तो पल में शिखर 
युद्ध की भाषा यदि बोलूँ, तो जीवन भी इक युद्ध है 
हम सभी बस जीतने में ही मंत्र मुग्ध है 
जीतना यदि चाहते हो तो हार को पढ़ना ज़रूर
कुछ पुरानी युद्धों को एक बार पढ़ना ज़रूर 
राणा सांगा की उस हार का वह व्यास भी कुछ ख़ास है 
बाबर ने अपने शब्दों में लिखा वह अमर इतिहास है 
क्यों करें पीछे क़दम, क्या हम भयभीत हैं 
अंत तक लड़कर हूँ हारा मेरी हार में भी जीत है
बात उस रण की करूँगा क्योंकि मैं इसी धरा का अंशज हूँ
हार कर फिर जितना, और जीत कर ही लौटना 
क्योंकि मैं महाराणा प्रताप का वंशज हूँ।

सिद्धार्थ शुक्ला - उन्नाओ (उत्तर प्रदेश)

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