इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी - ग़ज़ल - अमित राज श्रीवास्तव "अर्श"

अरकान : फ़ाइलुन फ़अल फ़ाइलुन फ़ाईलुन मुफ़ाइलुन फ़ा
तक़ती : 212 12 212 222 1212 2

इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी।
आज जा के देखा मुहब्बत कितनी बची हुई थी।।

आपसे जहाँ बात फिर मिलने की कभी हुई थी,
आज मैं देखा गर्द उन वादों पर जमी हुई थी।

लग रही थी हर रहगुज़र वीराँ हम जहाँ मिले थे,
सिर्फ़ ख़ूब-रू एक याद-ए-माज़ी सजी हुई थी।

सोचता हूँ तक़दीर कितनी थी मेहरबान हम पर,
क्यूँ मगर ये तक़दीर अपनी उस दिन क़सी हुई थी।

आपको भी आ कर ज़रूरी था एक बार मिलना,
चौक पर वही चाय मन-भावन भी बनी हुई थी। 

अमित राज श्रीवास्तव "अर्श" - चन्दौली, सीतामढ़ी (बिहार)

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