जयराम यादव - नालिया, कच्छ (गुजरात)
युवा : मनुष्यता का नया सवेरा - कविता - जयराम यादव
सोमवार, अक्टूबर 19, 2026
मानव अपनी मानवता की राह भूल जब जाता है,
मर्यादा का पावन बंधन पल में ही बिखराता है।
करुणा, दया, परमार्थ जब मौन खड़े रह जाते हैं,
स्वार्थ के संकरे पथ तब जीवन को भरमाते हैं।
सत्य, प्रेम और धर्म सभी प्रश्नों में घिर जाते हैं,
लोभ-अहंकार के बादल क्षण में नभ पर छाते हैं।
छा जाए चहुँ ओर जब घोर निराशा का डेरा,
कौन जगाए आश-किरण? कौन बने नव-सवेरा?
उठना होगा नवयुवकों को दृढ़ संकल्प सजाने को,
विवेक और कर्म-दीप की ज्योति दिल में जलाने को।
श्रम और साहस से युग का मान बढ़ाना होगा,
बिखर चुकी मानवता को फिर से गले लगाना होगा।
आँसू में मुस्कान जगाएँ, हर मन में विश्वास भरें,
टूटे हर सपने जोड़-जोड़कर नवजीवन का राग धरें।
युवा वही जो स्वयं जले और जग में प्रकाश फैलाए,
अपने आदर्शों से जग को मानवता का पथ दिखलाए।
हर युवा मानवता का जब दीप प्रज्वलित कर पाएगा,
भारत संग विश्व भी नवयुग का स्वागत गाएगा।
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