घोर अंधड़ - कविता - प्रवीन 'पथिक'

घोर अंधड़ - कविता - प्रवीन 'पथिक' | Hindi Kavita - Ghor Andhad - Praveen Pathik
हर दिन
एक नया सबेरा लिए आता है।
पर बात;
वही पुरानी होती है।
मन में घोर अंधड़, पुरानी स्मृतियाँ, वही विचार
एक साथ कौंधता है हृदय में
जीवन की गतिविधियाँ पैंतरे बदल
पहुॅंच जाती है;
उसी मनोदशा में।
जहाॅं मन पुनः उदास हो जाता है।
कोई रंगत नहीं, कोई उत्साह नहीं
सभी चेहरे मायूसी के तम सागर में डूबे
एक गहरे पीड़ा को अभिव्यक्त करते हैं।
कुछ मुख पर झूठी मुस्कान टाँगे,
अपने दर्द को छिपाने का
झूठा प्रयत्न करते हैं।
तो कुछ टूट जाते हैं
समाज द्वारा की गई निंदा, तिरस्कार
अथवा व्यंग बाणों के प्रहारों से।
जीवन भार लगने लगता है।
व्यर्थ लगने लगता है सब कुछ।
सभी क्रियाएँ–
अव्यवस्थित और अप्रयोजित हो जाती हैं।
तब एकांत और मौन ही
शांत करता है
उतप्त भावनाओं को
तत्क्षण।


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