तिरंगा - लेख - सुनीता भट्ट पैन्यूली

हवाओं में आज देश-भक्ति की प्रगाढ भावना इस तरह फैल गई है कि फ़िज़ाएँ ख़ुशबूदार हो गई हैं मेरा भारत महान की प्राकट्य लहर से।

यूँ तो तिरंगे का सम्मान करना हमने बचपन से ही माँ की लोरी व पिता द्वारा दिए गए जीवन-मूल्यों से सीख लिया था।
जब हम बड़े हुए तो भारत की आज़ादी और इसकी अखंडता को बनाए रखने के लिए बहुत से महान लोगों के संघर्ष, बलिदान, त्याग और उनकी शौर्य गाथाओं के बारे में हमने जाना और परिपक्वता की दहलीज़ पर तिरंगे के सम्मान का रंग हमारी नसों में और भी गाढ़ा हो गया।
स्कूल के दिनों में प्रार्थना के दौरान ली गई प्रतिज्ञा–
"मैं भारतीय हूँ, भारत की रहने वाली हूँ। भारत मेरा देश है। मुझे भारतीय होने पर गर्व है।
भारत माता की जय।"

मुझमें आज यह चेतना भरती है कि हम लोकतंत्र हैं हम सभी को तिरंगे ने एक सूत्र में बाँधा है। हम सभी धर्मों को साथ लेकर चलने वाले हैं। हमारी तिरंगे के नीचे एकजुटता व संयुक्तता हमारी पहचान है।.विश्वभर को शांति एवं अहिंसा का पाठ हमने ही सिखाया है।

तिरंगे के इतिहास को जानने के लिए यह जानना भी ज़रूरी है कि हम एक विराट संस्कृति के युग से संबंधित खेत-खलिहानों की मिट्टी में उपजे साधारण मानव हैं किंतु हम असाधारण भी हैं क्योंकि हमने अपनी जड़ों की धर्म, संस्कृति, पराक्रम, ऐश्वर्य के व्यक्तित्व को अपने भीतर उतारा है तिरंगे को अंगीकार करके। हम भारतवासियों के  भाल पर गौरव की गाथा है तिरंगा।
प्रत्येक स्वतंत्र देश का अपना एक राष्ट्रीय ध्वज होता है और यही राष्ट्रीय ध्वज हर भारतीय की पहचान है। अर्थात किसी भी देश का ध्वज होना उस देश के आज़ाद और स्वच्छंद होने का प्रतीक है।

तिरंगे का इतिहास आज़ादी से मात्र कुछ दिन पहले का नहीं है वरना झंडा, पताका या ध्वज का इतिहास हमें धर्म-ग्रंथों, महाकाव्यों, सिंधु घाटी व राखीगढी की सभ्यताओं में झंडे के विभिन्न स्वरूपों के रुप में इतिहास में मिलता रहा है।
यह जानना भी ज़रूरी है कि ध्वज और पताका में भी भेद होता है। पताका त्रिकोणाकार होती है जबकि ध्वजा चतुष्कोणीय। ध्वज हमारी संस्कृति में किसी भी कार्य के निर्विघ्न रूप से संपन्न होने या उस विशेष संस्कृति और संस्था की पहचान भी है।

पुरातन समय से ही झंडे हमारी भारतीय परंपरा के संवाहक रहे हैं। जहाँ ब्रहमा की हंस ध्वजा, विष्णु की गरूढ ध्वजा, महेश की वृषभ ध्वजा, दुर्गा की सिंह ध्वजा, गणेश की कुंभ ध्वजा, कार्तिकेय की मयूर ध्वजा, वरूणदेव की मकर ध्वजा, अग्निदेव की धूम ध्वजा, कामदेव की मकर ध्वजा, इंद्रदेव की एरावत और वैजयंति ध्वजा, भगवान राम की सूर्य ध्वजा, राजा युधिष्ठिर का स्वर्ण चंद्र ध्वज, कृष्ण की गरूड़ ध्वजा, पुरी के जगन्नाथ मंदिर में हवा के विपरीत दिशा में रहस्यमय तरीक़े से उड़ता हुआ ध्वज, ये ध्वज या पताका एक सामूहिक धार्मिक भावना के अंतर्गत जुटने, अपनी सुरक्षा के प्रतीक के रुप में, अपने राज्यों के शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन करने हेतु, लोक कल्याण व अपने दायित्वों के निर्वाह हेतु प्रतिनिधित्व करने, प्रतिष्ठा की रक्षा हेतु हमारी समृद्ध विरासत के रुप में चारों युगों में साक्ष्य के रूप में मिलते रहे हैं। इसी के चलते अपने धर्म, अपनी विरासत, अपनी परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर से दुनिया व समुदाय का परिचय कराने हेतु ध्वज व पताकाओं ने हमारी सभ्यताओं और युगों की कोख से जन्म लिया।
जैसे-जैसे नए युग में हमने पदार्पण किया समय के साथ हमारी संस्कृतियों में हमारे ध्वजों का भी स्वरूप बदलता रहा।

हम सभी भारतीय गौरवान्वित हैं कि हमने अपनी धनी व सभ्यागत लोकाचार से विमुख न होकर आधुनिक एवं विकसित भारत का परचम लहराया है। तिरंगे के उन्मुक्त लहराने के आच्छन्न हमारी सदियों की संस्कृति व इतिहास का ना जाने कितना संघर्ष व कितना टकराव छिपा है किंतु हम सभी को ज्ञात होना चाहिए कि तिरंगे का झंडा न केवल हमारी नई पीढी के भविष्य के लिए तय, उच्च दृष्टिकोण है अपितु हमारे स्वर्ण अतीत की गाथा और सांस्कृतिक मूल्यों की नींव भी हैं जिस पर हम भारतीयों को गर्व है।

1921 में महात्मा गांधी का एक लेख यंग इंडिया पत्रिका  में प्रकाशित हुआ था। जिसमें उन्होंने कहा "एक ऐसा राष्ट्रीय ध्वज बनना चाहिए जिसके लिए सभी धर्मों के लोग अपनी जान दे सकें"
इस ऐतिहासिक कार्य को आंध्रप्रदेश के एक महान स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वैंकेय्या ने जीवंत रुप दिया। तिरंगे को तैयार करने के लिए उन्होंने तीस से ज़्यादा देशों के राष्ट्रीय ध्वजों का अध्ययन किया। पिंगली वैकेय्या को झंडा वेंकेय्या के रूप में भी जाना जाता था क्योंकि उन्होंने तीस देशों के झंडों का अध्ययन करके 1916 में भारतीय ध्वज के लिए तीस डिज़ाइनों पर एक पुस्तक प्रकाशित की थी।

पन्द्रह अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व  22 जुलाई, 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक हुई जहाँ डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में तिरंगे को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अंगीकार किया गया।
भारतीय तिरंगे को एक ख़ास लंबाई-चौड़ाई में बनाया जाता है। तीन अनुपात दो यानि कि लंबाई चौड़ाई से डेढ़ गुना अधिक होती है।
भारत के राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियाँ हैं।सबसे ऊपरी पट्टी का रंग केसरिया है जो हमारे देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में सफ़ेद रंग शांति और सत्य के लिए है। नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी देश के विकास और समृद्धि को दर्शाता है। ये तीनों ही पट्टियाँ समानुपात में हैं। तिरंगे के मध्य में स्थित सफ़ेद पट्टी के बीच में नीले रंग का चक्र होता है। इस चक्र में चौबीस तिलियाँ होती हैं। इस चक्र का व्यास सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है। इस चक्र में जो 24 तिलियाँ लगी हैं उसका अर्थ है जीवन गतिमान है ये चौबीसों घंटे चलता रहता है। इस चक्र को सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ से लिया गया है।

हमारे राष्ट्रीय ध्वज को हमारे स्वतंत्रता के राष्ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया और तभी इसे मान्यता मिली। आज तिरंगा हमारे समक्ष जिस रूप में है, उसे यहाँ तक पहुँचने के लिए बदलाव की विभिन्न प्रक्रियाओं से होकर गुज़रना पड़ा है।

प्रथम ध्वज 7 अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीनपार्क) कलकत्ता में कांग्रेस के अधिवेशन ने फहराया था। जिसे अब कोलकाता कहते हैं। 1904 में यह ध्वज स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ आध खिले हुए कमल के फूल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे वे बीच की पीली पट्टी पर वंदे मातरम् लिखा गया था।

द्वितीय ध्वज 1907 में  पेरिस में मैडम भीकाजी कामा और उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था।
पहले ध्वज में और इसमें समानता थी, फ़र्क़ इतना था कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर एक कमल था। किंतु सात तारे सप्त ऋषि को दर्शाते हैं।
यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में प्रदर्शित किया गया।

तृतीय ध्वज 1917 में अस्तित्व में आया। डॉ॰ एनी बेसेंटऔर लोकमान्य तिलक द्वारा इसे फहराया गया। इस झंडे में पाँच लाल और चार हरी क्षैतिज पट्टियाँ एक के बाद एक और सप्त ऋषी के अभिविन्यास में इस पर बने सात सितारे थे, बाँई और ऊपरी किनारे पर खंबे की ओर युनियन जेक था। एक कोने में सफ़ेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
पिंगली वेंकैया ने जो झंडा बनाया था वह दो रंग लाल और हरे से बना था, जो दो समुदायों हिंदू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है। गांधी जी ने इस पर सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें  एक और सफ़ेद पट्टी और इसके मध्य में राष्ट्र की प्रगति को दिखाने के लिए एक चलता हुआ चक्र होना चाहिए। तिरंगे का यह स्वरूप जो हमारे वर्तमान झंडे का पूर्वज है  स्वतंत्रता के पश्चात इसका रंग और महत्त्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म-चक्र को दिखाया गया।

26 जनवरी, 2002 को भारतीय ध्वज-संहिता में संशोधन किया गया और स्वतंत्रता के कई वर्षो बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फ़ैक्ट्री में ना केवल राष्ट्रीय दिवसों पर बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रूकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। भारतीय नागरिक अब कहीं भी और किसी भी समय राष्ट्रीय झंडे को फहरा सकते हैं। बशर्ते कि ध्वज संहिता का भली-भांति पालन होना चाहिए।
भारतीय ध्वज संहिता 2002 को तीन भागों में बाँटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्ट्रीय ध्वज का सामान्य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्थानों आदि के सदस्यों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्द्रीय और राज्य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों दर्शाया राष्ट्रीय ध्वज के प्रर्दशन के बारे में जानकारी देता है।

हम सभी संस्कृतियों को साथ लेकर चलने वाले देश हैं।हमने ही धरती पर वेद, पुराण, विभिन्न धर्मों कै साहित्य को स्वयं में समाहित कर संपूर्ण विश्व को विभिन्नता में सामंजस्यता का पाठ पढ़ाया है।

आने वाली पीढ़ियों को हमें कैसा भारत सौंपना है? निश्चित ही यह हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि हमारी आने वाली पीढ़ी हमारी पुरातन संस्कृति से संपन्न, आर्थिक रूप से समृद्ध, सुशिक्षित, व स्वस्थ होने के साथ ही उच्च जीवन मुल्यों की द्योतक भी हो।

भारत की आज़ादी के अमृत महोत्सव के साथ ही यह वर्ष तिरंगे का अमृत महोत्सव भी है।
हम भारतीयों की पहचान हमारा तिरंगा है। तिरंगा हमें 75 वर्षों से एक सूत्र में बांधता आया है।

अब वक़्त नए युग के निर्माण का है। हमें ऐसे नए भारत का निर्माण करना है जो सांप्रदायिक समानता, बैर-वैमनस्य से दूर हो। हमें हमारे स्वर्णिम इतिहास जहाँ देश की आज़ादी के लिए मर-मिटने की सैनिकों के शौर्य व पराक्रम की गौरवशाली गाथाएँ हैं, जहाँ स्वयं के अधिकारों एवं आज़ादी के हक़ के लिए किसानों के संघर्षपूर्ण आंदोलन की निर्मम व अनुकरणीय असंख्य उदाहरण हैं। जहाँ देश की आज़ादी के लिए अपने घर परिवार और जीवन को तिलांजलि देकर देश को आज़ाद कराने वाले क्रांतिकारियों की, हमारे रग-रग में देशभक्ति का जोश भरने वाली अमर व अविस्मरणीय व श्रद्धेय क़िस्से है ऐसी समृद्धता को स्वयं में संजोकर जिसमें हमारे पूर्वजों द्वारा स्वयं अच्छा और बुरा जो भी उन्होंने भोगा है, उसमें से जो मुल्यवान जीवन-आदर्श निकालकर उन्होंने हमें सुपुर्द किए हैं उन्हें समृद्ध धरोहर समझकर हमें ज्ञान-विज्ञान,प्राद्योगिकी, शिक्षा, तकनीकी, आदि उन्नति के रास्तों की ओर निरंतर अग्रसर रहना चाहिए।

तिरंगे का अभिप्राय वर्तमान में एक नवीन दृष्टिकोण नई धमक व नया उदेश्य है। वह विकास के पहियों पर गतिमान एक तीव्र लहर है। तिरंगा हमारी राष्ट्रीय पहचान है हमें इसका सम्मान करना चाहिए। किसी भी रूप में इसकी छवि धूमिल ना हो इस कर्तव्य के निर्वाह के लिए हमें हमेशा प्रतिबद्ध रहना चाहिए।
जय हिंद!
जय भारत!

सुनीता भट्ट पैन्यूली - देहरादून (उत्तराखंड)

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