सुनील खेड़ीवाल - चुरू (राजस्थान)
संविधान दे के गया कोई - कविता - सुनील खेड़ीवाल
शुक्रवार, अप्रैल 15, 2022
ये ज़ीस्त-ए-अंदाज़-ओ-गुफ़्तगू,
ये जीने का असरार-ओ-सलीक़ा देके गया कोई।
अहसान कैसे चुकाऊँ मैं उस शख़्सियत का,
बदतर ज़िंदगी से उबारने को संविधान दे के गया कोई।
कि वो अकेला ही सींच गया तब हमारे आज को,
बीती इक मुद्दत, पर मत भूलों मुद्दतों तक; कि अपने भी अरमान देके गया कोई।
कभू मकतब में भी अपनाया न गया वो,
कहूँ मुकम्मल हस्ती उसे, कि तालीम का इख़्तियार देके गया कोई।
उठो जागो, जिस्म से ही नहीं, रूह से भी यारों,
यूँ ही नहीं माँझी को पतवार देके गया कोई।
हश्र का दौर था, पर बनकर दावर-ए-हश्र ग़लीज़ से पार उतारा,
और समानता के अधिकारों की भरमार देके गया कोई।
रहो, एहतिमाम से परे जो मानव-मानव में भेद करें,
मत पिटों ऐसी लकीरों को, ये आह्वान देके गया कोई।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
दीपावली विशेष रचनाएँ: कविता, गीत, दोहे और मुक्तक का सुंदर संकलन
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

