गिरती दीवारें - कविता - कार्तिकेय शुक्ल

गिरती दीवारें
और भी बहुत कुछ 
गिरा लाती हैं अपने साथ,

सिर्फ़ मिट्टी और रेत के कण नहीं,
जल के बूँद और लोहा भी नहीं,
बल्कि उन मज़दूरों का पसीना भी
जो दिन भर तपने के बाद
कहीं होता था तैयार।

कारीगरों के हाथ का 
वो छाला आता रहता याद
जिसे अस्वीकार कर के भी
कर न पाया कभी अस्वीकार।

खाता रहा तरस
उन नव युवतियों के यौवन पर
जो उम्र से बहुत पहले 
दी गईं थीं ब्याह
और पीठ पर बाँध बच्चों को
कर रही थीं लगातार काम

उन किशोरों के क़िस्मत पर
जिनके माथे लिख दी गई थी
सिवाय दिहाड़ी मज़दूर के
तुम्हारी कोई और नहीं पहचान।

पुरुष जो अगले पंक्ति में खड़े
निश्चल आँखें 
देखे जा रहे थे एकटक
कुछ रह न जाए बाक़ी
कुछ हो न जाए बेकार,
अधपके बाल और धँसे गाल
दे रहे थे ये गवाही
रोज़-रोज़ तपते हैं हम,
तब तैयार होता है पक्का महाल।

कार्तिकेय शुक्ल - गोपालगंज (बिहार)

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