कहने को लोग बड़े हो गए - कविता - गुड़िया सिंह

जैसे ही बचपन बीती,
कहने को लोग
बड़े हो गए।
उँगली थाम कर
गिरते सम्भलते थे,
जब से हैं अपने पैरों पर
खड़े हो गए,
उम्र थोड़ी क्या बीती,
संग बहुत कुछ गुज़र गया।
खिलखिलाति हँसी,
लम्हों का शुकुन,
न जाने कब किधर गया।
ना रही मासुमियत बातों में ही, 
ना आँखों में सच्चाई रही,
ना बचा थोड़ा भी बचपना,
ना ही हृदय में,
वैसी अच्छाई रही।
कल, छपट, फ़रेब
सभी को भा गया,
अहम, ईष्या, द्वैष,
मन में सबो के आ गया।
बदल गया बहुत कुछ,
क्यों कभी किसी को,
अफ़सोस ना हुआ।
किस नींद में सोता रहा इन्सान,
कि इतना कुछ खोने का,
होश न रहा।
कितना अच्छा होता,
लोग बड़े होकर भी,
नदान रह जाते,
ज़िन्दा रहती जो मासुमियत,
तो ताउम्र इंसान रह जाते।
फिर होती किसे,
गिला शिकवा किसी से,
साज़िशें, रंजिशें ना होती,
होता भाईचारा, सम्बन्धों में,
बचपन का मान रख लेते।

गुड़िया सिंह - भोजपुर, आरा (बिहार)

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