न आदि न अंत - कविता - प्रवीन 'पथिक'
शनिवार, जनवरी 10, 2026
हर रोज़ एक वही विचार
आता है मेरे मन में;
उसी रंगीन चिड़िया की भाँति
जो मेरे नीम के पेड़ पर लगे
घोंसले में चुपके से आती है।
और चहचहाते हुए
अपने आने का एहसास कराती है।
विचार झकझोरते हैं मानस को
फिर शांत हो;
विलीन हो जाते किसी शून्य में।
जिसका न आदि है न अंत।
वह चिड़िया जो,
नित्य घोंसले से उड़कर उस अन्नत आकाश में,
ओझल जाती है;
एक सुनहले स्वप्न लिए।
वैसे ही मेरा मन!,
खो जाता है किसी गहन विचारों में।
जिसका न आदि ज्ञात है न अंत।
वीरान वन में,
एक अकेला पेड़!
अपने सभी साथियों से बिछड़कर
अपने दृढ़ इरादे से
जाड़ा, गर्मी, पतझड़ सहकर भी
खड़ा है उसी उम्मीद पर
जिस स्वप्न को उसने देखा था;
या सजाया था
उसके अभिन्न किसी सहचर ने।
अन्नत काल से एक विचार
अन्तर्द्वन्द के रूप में
कुरेदता है हर मानस को
जिसकी पीड़ा अंतः में होती है।
इसका भी
न आदि ज्ञात होता है
और न कभी अंत।
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