हे! नारी - कविता - सुषमा दीक्षित शुक्ला

हे! नारी तुम तो हो सब पर भारी।
तुम अनुपम हो सबसे न्यारी।
तुम कुछ भी व्यर्थ नहीं होने देती, 
सहेजती हो संभालती हो,
ढकती हो बाँधती हो,
आशाओं के अंत तक,
कभी तुरपाई कर, कभी टांक कर,
कपड़े के बटन से लेकर,
रिश्ते भी घर का सामान भी,
और घर परिवार भी।
कभी छाँट बीन कर,
कभी जोड़-तोड़ कर,
कभी धूप लगाकर,
कभी हवा में लहरा कर,
खाली डिब्बों से लेकर,
बची हुई थैलियों तक,
घुनी हुई दालों से लेकर,
सूखती सब्जियों तक,
फफूंदी वाले अचार से,
बासी बची रोटियों तक,
सबको ताजा परोस,
खुद बांसी से काम चला,
सीलन भरी दीवारोंं को,
तस्वीरों से छुपा कर,
घर की सारी कमियों को,
ख़ामोशियों के दुपट्टे से,
इज़्ज़त की तरह छुपा कर,
तक़लीफ़ देते रिश्ते तक,
निभाती हो हँस-हँसकर।
तुम श्रद्धा तुम ममता,
तुम हो सागर से गहरी।
घर से लेकर बाहर तक,
सब कुछ हँसकर निपटाती,
सुबह शाम दिन रात दुपहरी।
हे! नारी तुम हो सब पर भारी।
तुम अनुपम हो सबसे न्यारी।

सुषमा दीक्षित शुक्ला - राजाजीपुरम, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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