हुप्पा का राज - कहानी - शिवम् यादव "हरफनमौला"

"हुप्पा" नाम सुनने में तो अजीब सा महसूस हो रहा है, परन्तु ये नाम ऐसा वैसा नहीं है। ये नाम एक आज के चर्चित खेलों में से एक लोकप्रिय खेल का है, जिसने क्रिकेट जैसे रोमांच से भरपूर खेल को बंदी बनाकर खेल की दुनिया में राज कर रखा है।जिस तरह क्रिकेट की उत्पत्ति इंग्लैंड में हुई, उसी प्रकार हुप्पा की उत्त्पति भारत देश में हुई।

कहते हैं "आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है" यह कथन बिल्कुल सच है, क्योंकि इंग्लैंड से आए फिरंगियों ने इस क्रिकेट के खेल का भारत में विस्तार किया। धीरे धीरे क्रिकेट ने भारत के कोने कोने में अपने पाँव जमा लिए, जब यह खेल धीरे धीरे शहरी इलाकों से ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचा। वहां गरीब किसानों के बच्चों में भी क्रिकेट खेलने का भूत सवार हो गया, परंतु किसान के बच्चों की इतनी हैसियत नहीं थी कि वो इतने बढ़ती महंगाई के दौर में एक अच्छा खासा बल्ला खरीद सकें। गाँव के बच्चों की हैसियत यहां तक थी कि दो चार लड़के मिल के एक लकड़ी के तख्ते को बढ़ई से कटवा छंटवा कर एक नाम मात्र का बल्ला बनवा लेते, उसी से क्रिकेट का भरपूर आनंद ले लेते, पर जब बढ़ई ने भी महंगाई का दौर जारी कर दिया तब क्या था, गाँव के बच्चे क्रिकेट की दुनिया से दूर होने लगे,तभी उत्तर प्रदेश के उत्तरी ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों ने एक छड़ी से क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया, परंतु एक मोटी सी छड़ी से रबड़ की गेंद की झन्नाहट हांथो तक उतर आती, यह महसूस कर, फिर उन्होंने रबड़ की गेंद बदल कर प्लास्टिक की गेंद से खेलने लगे, जिससे उनकी समस्या का समाधान हो चुका था। जब उन्हें प्लास्टिक की गेंद में थोड़ी सी भी गति नहीं दिखी तब उन्होंने खुद डंडे से गेंद को उछालकर स्वयं चौका छक्का जड़ना शुरू कर दिया, पर एक हाथ से गेंद को उछालने और एक हाथ से उसे मारने में उन्हें कुछ दिक्कत हो रही थी, तब उन्होंने जमीन पर दो समूची ईंटे एक दूसरे के समांतर रखकर और गेंद को लटकने भर की ईंटों के बीच में जगह देकर, और दोनों ईंटों के बीच एक मोटी छड़ी डाल कर उन्होंने गेंद को ऊपर उछालना शुरू किया, अब दोनों हाथों से डंडे को मजबूत पकड़कर गेंद उछालकर चौके छक्के जड़ने में बहुत आनंद आने लगा। यहीं से धीरे धीरे यह हुप्पा खेल सट्टेबाजों द्वारा सट्टा लगाकर खेला जाने लगा। अब गाँव के लड़के दूर दूर तक सट्टा लगाकर यह खेल खेलने जाने लगे। 

लड़कों में धीरे धीरे हुप्पा का मनोरंजन बढ़ता गया, और उनमें स्वदेशी खेल की भावना जाग्रत हुई, और वो अब विदेशी खेल क्रिकेट को खेलना भूल ही गए थे, क्योंकि हुप्पा में क्रिकेट से ज्यादा रोमांच होता है। इसमें अधिकतर नियम क्रिकेट से मिलते जुलते हैं। यह खेल आज की इक्कीस वीं सदी में गांवों में नहीं बल्कि धीरे धीरे शहरी इलाकों में भी अपने पांव जमा चुका है। रोमांच से परिपूर्ण व रोमांच से सराबोर यह खेल अब केवल राष्ट्रीय स्तर के खेलों का हिस्सा बनने वाला ही है। इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों पर पानी फेर अपना कब्जा जमा लिया है, अब आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं, कि कितना रोमांचक होगा यह खेल!

मनोरंजन से परपूर्ण व ग्रामीण लोकप्रियता में डूबा हुआ यह खेल मुझको बहुत ही पसंद है। मैं प्रतिदिन हुप्पा खेलता हूं।
इस भारतीय मूल के खेल को आजमाकर देखें, बहुत ही आनंद प्राप्त होगा।

शिवम् यादव "हरफनमौला" - लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश)

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