कवि कुमार प्रिंस रस्तोगी - सहआदतगंज, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
प्रकृति दृश्यमय है - कविता - कवि कुमार प्रिंस रस्तोगी
शुक्रवार, सितंबर 25, 2020
प्रकृति का वह दृश्य नवेला
युगो युगो के जैसा था वह
जैसा कल देखा था मैंने
उदयाचल में लाल था गोला
पल-पल बढता देखा मैंने।
आसमान के मेघा पर वह
रंग बदलता पीला गोला
पूरब से पश्चिम में जाते
एक उजेला ढलते देखा।
अंबर की वह एक पहेली
छुपे हुए मेहों में थी वह
पल भर में फिर बुझ गई
शाम नूरानी छोड़ गई।
रात पहेली जाग गई
सन्नाटे की थी एक माया
चांद सवेरे का जैसा था
तारों से मंडित हुआ आसमां।
ठंडी ठंडी थी बयार वह
उत्तर से दक्षिण में बहती है
मन आनंदित झूम उठा
तन रोम-रोम वह चहक उठा।
अंधकार के नभ मे मैंने
तिमिराँचल को ढ़लते देखा
एक सवेरा उगते देखा
प्रकृति का वह दृश्य नवेला।
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