खामोशियों की आवाज - लेख - सुषमा दीक्षित शुक्ला

सच तो यह है कि खामोशियां भी बोलती हैं, बस उनकी आवाज सुनने वाले कान होने चाहिए। खामोशियों की आवाज कानों के बजाय आत्मा एवं विवेक से सुनी जा सकती है।

मेरी एक नज़्म इसी विषय मे है:
खामोशियों से कह दो वह अब तो मान जाएं।
दीवानगी से कह दो ना छोड़ तू वफाएं।
खामोशियां भी कई प्रकार की होती हैं।
प्रेम सम्बन्धो में अक्सर ऐसा ही होता है  कि जब  प्रेमी युगल में एक खामोश रहकर दूसरे का प्रणय निवेदन स्वीकार करता है या इन्कार परंतु उस खामोशी में या तो उसकी मौन स्वीकृति छुपी होती है उसकी आवाज बनकर या अस्वीकृति भी, जो दूसरा पक्ष उसके मन की भाषा को सहजता से ही पढ़ लेता है और उसकी भावना को समझ सकता है।
परिवार में माता-पिता, भाई-बहन एवं संतान के एक दूसरे से प्रति प्रेम या दो दोस्तों के मध्य आपसी प्रेम भी हमेशा खामोशी की भाषा में ही छुपे होते हैं। यह लोग आपस में कभी नहीं बयान करते कि वह एक दूसरे से बेहद प्यार करते हैं मगर उनके खामोश प्रेम को सहजता से पढ़ा जा सकता है।
ठीक उसी प्रकार, मृत्यु, भी खामोशी की परम एवं चरम अवस्था है मगर आवाज तो उसमें भी होती है।
दिवंगत की मृत्यु की खामोशी भी उसके परिजनों को, स्वजनों को स्मृतियों के रूप में सुनाई देती रहती है। वह  खामोशी की आवाज ही परिवार को धीरे धीरे हिम्मत देती  है कि, मैं साथ ही हूँ कहीं नहीं गया, वह मौन एक सब्र का सबब बनता है, सब्र की आवाज बनता हैं।

अक्सर ऐसा भी देखा गया है कि अपने परिवार का या आस पास का कोई व्यक्ति अचानक खामोश गुमसुम सा रहने लगता है तो हो सकता है कि वह किसी परेशानी की वजह से डिप्रेशन मे चला गया हो, ऐसे मे उसकी खामोशी और असहजता को पढ़कर उसकी मदद करनी चाहिए क्योंकि वह ऐसे हालात मे अपनी भावनाये व्यक्त नही कर पाता  और अंदर ही अंदर घुटता रहता है जिसके बड़े ही भयानक परिणाम हो सकते हैं वह आत्महत्या तक कर सकता है, अतः अचानक आयी हुई किसी की खामोशी की भाषा को पढ़ना  चाहिए शायद ये सतर्कता किसी की मदद बन जाये, किसी के जीवन के काम आ जाय।

कभी-कभी किसी के प्रति अपराध करने पर पीड़ित व प्रताड़ित व्यक्ति की खामोशी भी अपने दोषी को डर बन कर व अपराध बोध बनकर सुनाई देती रहती है।
अगर हम किसी के बचाव में कोई खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं तो वह मौन ही स्वयं की अंतरात्मा को ग्लानि बनकर सुनाई देता रहता है।

अगर कोई व्यक्ति कष्ट सहकर अंदर ही अंदर घुट घुट कर खामोशी की चादर ओढ़ कर जुल्मों को सहता रहता है मगर फिर भी उसकी ख़ामोशी में भी एक आवाज छुपी होती है एक दर्द की आवाज जो अपराधी को अपराध बोध के रूप मे सुनाई देती है। जो उसके दोषी के कर्मों का नतीजा होती है।
या जब किसी की गलती पर उसके बचाव में कोई खामोश हो गया हो तो कभी-कभी व्यक्ति खामोशी तोड़ना चाहता है और दूसरे के दबाव में, प्रभाव में खामोश रहना पड़ता है।मगर उनके जेहन मे भी स्वयं की खामोशी की आवाज सालती रहती है घुटन बनकर।

जब किसी को कई कारणों से खामोशियों का चोला ओढ़ लेना पड़ता है तो वह भी अंदर ही अंदर घुटता रहता है और जलता रहता है।
सच तो यह है कि खामोशियां बोलती हैं बस उनको सुनने की जरूरत है। कुछ लोग तो जानबूझकर अनसुना कर देते हैं, अंजान बने रहते हैं। दूसरे की खामोशी की आवाज नहीं सुनते।
परंतु ऐसा नहीं है कि खामोशी में आवाज नहीं है, ख़ामोशी में कोई न कोई आवाज होती है जरूर होती है, जरूरत है तो उसको सुनने की समझने की।

सुषमा दीक्षित शुक्ला - राजाजीपुरम, लखनऊ (उ०प्र०)

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