अमर घर चल - कविता - सतीश श्रीवास्तव

अमर घर चल
अब नहीं कहना पड़ता
अमर अब रहता है घर के अंदर
उसे पता है
घर पर रहने के फायदे
अब नहीं कहना पड़ता
झटपट कर
नल पर चल
नहीं कहना पड़ता अमर चल पाठ पढ़
पढ़ता रहता है स्वयं ही
बार बार हाथ धोता है अमर 
तब नहीं सीखा था जब
रोज सिखाते थे
हाथ धोना अमर
हाथ धोना अमर
अब सीख गया
जब पता पड़ा कि
हाथ नहीं धोने से आसमान गिर सकता है सिर पर 
सही है
कुछ सीखता है आदमी
घर से, परिवार से
स्कूल से,समाज से
और
ठोकरें भी सिखातीं हैं
बहुत कुछ
यहां तो भय ने पढ़ाया पाठ और
अक्षरशः याद भी हो गया।
कभी कभी बादाम से भी ज्यादा याददाश्त बढ़ाने में कारगर होता है भय
भय के वशीभूत लोग
निडर नहीं होते
हां सावधान रहना सीख लें
यही क्या कम है।

सतीश श्रीवास्तव - करैरा, शिवपुरी (मध्यप्रदेश)

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