संदेश
भोर से साँझ तक - कविता - मीनाक्षी पँवार
उगता है सूरज या उगती है भोर, चढ़ता है सूरज या चढ़ता है शोर। बिंदु-सा दिखता पर रहता चहुँ ओर, फैलाकर रंगों को करदे विभोर। चहके हैं पंछी …
सूर्यास्त को भी करें प्रणाम - कविता - गणपत लाल उदय
चलों आज हम ढलते हुए इस सूर्य को करें प्रणाम, साॅंझ हो गई संस्कारों व संस्कृति का करें सम्मान। भानु दिनकर भास्कर दिवाकर मार्तंड इसका न…
सूरज - हाइकु - आशीष कुमार
1. सूरज हूँ मैं प्रकाश बिखेरता तम मिटाता 2. सौर मंडल गतिशील रहता परिक्रमा में 3. ऊर्जा स्रोत हूँ संचरण करता जोश भरता 4. जीव जगत निर्भर…
मैं सूरज हूँ - कविता - राकेश कुशवाहा राही
मैं क्षितिज का डूबता सूरज हूँ, मैं क्षितिज का उगता सूरज हूँ। मैं डूब अँधेरी गुहाओं में कहीं, तारों को महत्ता देता रहता हूँ। चाँद सूरज …
बालहठ - कविता - सुनीता भट्ट पैन्यूली
साँझ की वेला में पहाड़ी के नीचे घास की बिछावन में लेटकर वह देखती निर्निमेंष सूरज की भावभंगिमा को कौतुहलता वश... सहसा सूरज उसके माथे पर…
खेले दिनमान - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
भोर हुई प्राची की गोद में खेले दिनमान! दिन उदय होते ही अँधेरा दूर हुआ! रात में नीड़ों में आराम भरपूर हुआ! दिन चढ़े सूरज ने कर दिया ध…
सूर्य की धरती - कविता - मनस्वी श्रीवास्तव
मैं धरती तू सूर्य मेरा... तेरे "प्रकाश" से चमक रही, नित हरित दूब सी महक रही, विघ्नों के विराम अवसर पर, शरद सा शीतल हुआ सवेरा…
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