बेटियाँ - कविता - प्रमोद कुमार

बेटियाँ - कविता - प्रमोद कुमार | Hindi Kavita - Betiyaan - Pramod Kumar
छनन-छनन छुम सुनते ही
दिल ख़ुश हो जाता है।
देख सुखद भविष्य के सपने
मन कहीं खो जाता है।
सोन चिरईं-सा घर-आँगन बीच
ठुमक-मटक जब चलती हैं–
ख़ूब इठलाती बेटियाँ!

किया शरारत भाई ने जब
ऐंठी, मुँह बिचकाई बैठी।
दौड़ाकर फिर उसको पकड़ा,
गरम-गरम दी कान-कनैठी।
पर अगले पल खेल-खेल में,
रूठे भाई-बहनों के संग,
लाड़ लड़ाती बेटियाँ!

रूढियों-बेड़ियों को तोड़ा है
धैर्य-हिम्मत का लिए सहारा।
देख निडरता इनकी काँपे
डर के मारे यह जग सारा।
आज़ादी का जश्न मनाती
चीर रहीं अब अंतरिक्ष को,
पंख फैलाती बेटियाँ!

कोई जमा पूँजी लूटे जस
कर जाती हैं पीहर सूना।
साथ निभा जीवन साथी का
कर देती हैं शान दोगुना।
जाने क्या-क्या सह जाती हैं
मान बढ़ाकर दो कुलों की,
रीत निभाती बेटियाँ!

माथा टेका, मन्नत माँगी,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर में।
धन अमोल बेटी के जैसा
कहाँ मिला पर सबके घर में?
ईश कृपा या पुण्य कमाई,
ख़ुश क़िस्मत वह जिसने पाईं–
मकुस्कुराती बेटियाँ!


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