कैसे तुम्हें बुलाता भला? - कविता - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र

कैसे तुम्हें बुलाता भला? - कविता - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र | Hindi Kavita - Kaise Tumhein Bulaata Bhala - Dr Ram Pramod Mishra
शब्द तुम, छन्द तुम, गीत और राग तुम
बेसुध-सा आलाप ले-ले मैं तुम्हें गाता रहा
कभी तो समझोगी मेरे निर्मल मनोभावों को
बस अपने मन को यही मैं समझाता रहा।

तुम मुखर हो बहुत कुछ कहती रहीं
मैं मौन हो सब कुछ बस सुनता रहा
शब्दों की गीली लकड़ियाँ सुलगती रहीं
आँच और धुएँ को बस मैं सहता रहा।

देह की कामना न रही कभी मुझे
प्रेम का स्वीकरण ही बहुत था प्रिये
शेष न रहता तुम से कुछ चाहने को
फिर तो जी लेता अधरों को सीए हुए।

जाने कैसी क्रीड़ा थी यह अद्भुत
न जीतीं तुम और न मैं हारा
मेघ बन गगन में तुम उड़ती रहीं
मैं धरा पर छाया तुम्हारी पकड़ता रहा।

प्रेम 'मेरा' पर मर्यादा तो 'हमारी' थी
पागलों-सा, बस मैं ही निभाता रहा
अपरिचित बन बढ़ गईं तुम आगे कहीं
किस सम्बोधन से तुम्हें बुलाता भला?

डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र - जनपद मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश)

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