डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र - जनपद मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश)
लेकिन अब नहीं - लघुकथा - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
शुक्रवार, जून 26, 2026
सुबह-सुबह रमावती के ढाबे पर चाय पीने वाले जमा हो जाते थे। चाय के साथ साथ उन्हें नाश्ते में उबले चने की मसालेदार घुघुनी मिल जाती थी। दुपहर और रात में खाने के लिए भात, दाल, रोटी सब्जी भी मिल जाती थी। यहाँ जमा होने वाले सभी लोग श्रमिक थे जिसमें पुरुष, स्त्री और काम कर सकने वाले सभी आयु के बड़े बूढ़े और बच्चे
भी शामिल थे। शहर से क़रीब बीस किलोमीटर दूर एक नई आवासीय कालोनी बसाई जा रही थी। इसलिए यहाँ रोज़गार के लिए दूर-दूर से लोग आ गए थे। रमावती भोर में पाँच बजे ही उठ कर तैयारी में लग जाती थी। उसका युवा बेटा भी अपनी माँ का हाथ बँटाता था। प्लास्टिक के दो बड़े बड़े ड्रम में पानी भरना, आटा गूँथना, सब्जी काट
देना और जूठे बरतन धो देना उसके ज़िम्मे का काम था।
एक दिन सुबह ही सुबह एक युवती ढाबे पर आ पहुँची। रमावती से पूछने लगी—
“काकी! यहाँ कोई काम मिल जाएगा क्या”?
“लगता है दूर से आई है। क्या नाम है? थोड़ी देर में ठेकेदार चाय पीने आएगा तो पूछती हूँ लेकिन यहाँ मेहनत मज़दूरी वाला काम ही मिल पाएगा। पहले क्या करती थी?”
“कमला नाम है। कुछ घरों में बरतन माँजने, झाड़ूपोंछा और दो घरों में खाना बनाने का भी काम करती थी”।
“तो वह सब छोड़ कर यहाँ मज़दूरी करने क्यों आ गई?”
“क्या बताऊँ काकी! सबकी नज़रें मैं पहचानती थी। आदमियों के बीच अकेले काम करने में डर लगने लगा था। वे लोग इज़्ज़त की निगाह से नहीं देखते थे।”।
“हाँ! ज़माना तो बड़ा गन्दा है। लेकिन यहाँ तो नौ घंटे की मज़दूरी करनी पड़ेगी “।
“कर लूँगी काकी! यहाँ तो पचास लोगों के साथ काम करना होगा। अकेले घर में अनहोनी होने जैसा ख़तरा तो नहीं रहेगा। काम ख़त्म और फिर अपने ठिकाने।
“रमावती की इन बातों को उसका बेटा माधव भी सुन रहा था। उसने महसूस किया कि जब से कमला आ कर बैठी थी, तब सेनई उम्र के लड़के कुछ ज़्यादा जुटने लगे थे।
उसने धीरे से यह बात अपनी माँ को बताई। उस समय तो रमावती कुछ न बोली।
थोड़ी देर में ठेकेदार आया। रमावती ने बात भी की, तो उसने कहा कि हफ़्ते भर में दूसरी साईट पर काम शुरू होने वाला है, वहीं व्यवस्था कर सकता हूँ।
कमला वहीं बैठी रही। रमावती ने कुछ खाने को दिया, चाय दी। दुपहर का खाना भी उसने वहीं खाया। फिर वो
रमावती से बोली—
“काकी! आज तो काम मिला नहीं। झोपड़े में जा कर करुँगी भी क्या? तुम्हारा ही हाथ बंटा देती हूँ।
रमावती कुछ कहती, इसके पहलेही उसने साड़ी ऊपर कसी और बरतन माँजने बैठ गई। उसके काम में तेज़ी और सफ़ाई देख
कर रमावती अचरज से भर गई। दुपहर हुई तो मज़दूर मर्द, औरतें, बच्चे और बूढ़े खाने के लिए जुटने लगे। कमला ने बड़ी कुशलता से थालियाँ लगाईं, जिसने जो माँगा, फटाफट पहुँचाया। इस बात पर रमावती ने भी ध्यान दिया कि युवा लड़के कमला से कुछ ज़्यादा ही मेल जोल बढ़ाने में रुचि दिखा रहे थे।
शाम हुई तो कमला चलने को हुई। न जाने क्या सोच कर रमावती ने कमला से कहा—
“जब तक काम नहीं मिलता तब तक यहाँ आ कर मेरी ही कुछ मदद कर दिया करो, जो उचित होगा, वह मेहनताना भी मैं तुम्हें दे दिया करुँगी”।
“ठीक ैह काकी! “कहतेहुयेकमला चली गई।
माधव बोला–” तुमने भाव ताव कुछ तय नहीं कि या और बुला बैठीं कल से। न जाने कितना माँगे”?
“आने दे! सब सुलझा लिया जाएगा”। सच्चाई तो यह थी कि रमावती ने भाँप लिया था कि कमला के रहने से उसके ढाबे की आमदनी बढ़ जाएगी।
अगले दिन से कमला नियमित रूप से आने लगी और वास्तव में रमावती और माधव ने यह महसूस किया कि अब भीड़ कुछ बढ़ गई थी और फलस्वरूप आमदनी भी।
कमला भी ख़ूब समझती थी कि उसके आने से क्या फ़ायदे हुए हैं। उसे भी संतोष थी कि जब तक काम नहीं मिल जाता, यहीं जुड़ी रहे। पेट भरने का काम तो निकल ही रहा था, ऊपर से ख़र्च के लिए भी रमावती उसे कुछ न कुछ पकड़ा ही देती थी।
क़रीब क़रीब महीना बीतने को हुआ पर अभी ठेकेदार के यहाँ काम अभी शुरू नहीं हुआ। लेकिन इस बीच कमला और माधव एक दूसरे के काफ़ी क़रीब आ गए। यह नज़दीकी रमावती से भी छुपी न रह सकी और उसने एक दिन माधव से पूछ ही लिया–
“क्या कहता है? कमला से तेरी शादी की बात करूँ”।
“मुझे क्या एतराज है? अच्छा ही रहेगा, उसके रहने से हमें तो फ़ायदा ही है”।
दो तीन दिन ढाबा बन्द रहा और इस बीच कमला और माधव की शादी हो गई।
चौथे दिन रमावती सुबह ही उठी और अपनी पुरानी दिनचर्या में लग गई। कमला भी उठी और तैयार हो कर ढाबे की ओर चलने को तैयार हुई ही थी कि रमावती ने रोक दिया।
“तुम नहीं जाओगी कमला, जो मदद करनी है यहीं कमरे पर रह कर कर दिया करना”।
“लेकिन काकी, इसमें नुक़सान ही क्या है, पहले भी तो मैं करती ही थी। मेरे रहने से आपको मदद भी मिल जाती थी और भीड़ बढ़ने से आमदनी भी तो बढ़ गई है”।
कमला ने मानो इशारे से ही यह जता दिया कि उसका ढाबे पर रहना इन लोगों के लिए कितना फ़ायदेमन्द साबित हो रहा था।
तब रमावती ने कहा—”मैने भी फ़ायदा सोच कर ही तुम्हें रखा था, लेकिन तब तुम मेरी कुछ लगती नहीं थी लेकिन अब तुम मेरी बहू हो। घर मेरा जैसा भी हो पर तुम अब मेरे घर की इज़्ज़त हो। पहले कुछ और सोच कर तुम्हें ढाबे पर रखा था लेकिन अब नहीं जाना है”।
कमला की आँखों में पानी भर आया। वह रमावती के पाँवों की तरफ़ झुकी पर रमावती ने उसे उठा कर कलेजे से लगा लिया। माधव अपनी अम्मा के इस परिवर्तन से हैरान था।
एक नारी द्वारा किसी नारी को दिए गए इस सम्मान को देख माधव भी मुस्कुरा उठा।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

