डिग्रियों के बोझ तले दम घुटता - कविता - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
रविवार, मई 17, 2026
डिग्रियों के बोझ तले सपनों का दम घुटता जाता,
रोज़गार के सूने पथ पर युवा मन क्यों छटपटाता।
भीड़ भरे इस दौर में प्रतिभा मौन खड़ी रोती है,
झूठे आश्वासन का सूरज हर दिन धुआँ बरसाता॥
कितने अरमानों की चिताएँ कोचिंग में जल जाती हैं,
माँ की आँखों की उम्मीदें क़िस्मत से टकराती हैं।
काग़ज़ वाले अंक यहाँ इंसानों से बड़े हो बैठे,
मेहनत की थाली में अक्सर केवल पीड़ा आती है॥
भविष्य बेचकर सत्ता केवल भाषण का दीप जलाती,
भूखे सपनों की हर धड़कन भीतर ही भीतर घबराती।
युवा शक्ति जब मौन रहे तो राष्ट्र दिशाहीन हो जाता,
टूटी आशा की हर किरचन आँखों में चुभती जाती॥
मुझे बहुत कुछ कहना है पर शब्द डरे सहमे रहते,
अन्यायों के ऊँचे पर्वत मन के भीतर ढहते रहते।
उठो युवाओं! समय पुकारे बदलो यह अंधी व्यवस्था,
साहस वाले ही इतिहासों में अमर सुनहरे रहते॥
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