मैं बच सकता था - कविता - सुरेन्द्र जिन्सी
शुक्रवार, जून 26, 2026
मैं बच सकता था
अगर मैंने कविताएँ कम पढ़ी होतीं।
अगर मैं
बस एक आदमी होता—
जिसे गेहूँ के भाव पता होते,
जो प्रेमिका की आँखों में
क्रांति नहीं ढूँढ़ता,
जो रात में
मरने की रिहर्सल नहीं करता।
लेकिन मैंने
शिव कुमार बटालवी को
सिर्फ़ पढ़ा नहीं,
अपनी नसों में घोला था।
अब हर ख़ुशी के बाद
एक पंजाबी विलाप
अपने-आप बजने लगता है भीतर।
मैं मारा जाऊँगा—
किसी बंदूक से नहीं,
अपने ही विश्वासों से।
क्योंकि मैंने
पाश की कविताओं को
नारे नहीं समझा,
रोटी की तरह खाया था।
और यह दुनिया
कविता खाने वाले आदमी को
ज़्यादा दिन जीवित नहीं रखती।
मैं छोड़ा गया हूँ
क्योंकि मैं
जॉन एलिया की तरह
प्रेम में सभ्य नहीं रह पाया।
मैंने औरत को
एक मनुष्य की तरह चाह लिया—
यहाँ यही सबसे बड़ा अपराध है।
रोना भी
मैंने हद से ज़्यादा रोया।
इतना कि
आँखें नहीं,
पूरा व्यक्तित्व भीग गया।
अब लोग
मुझसे हाथ मिलाने से पहले
अपनी उंगलियाँ बचाते हैं।
कभी-कभी सोचता हूँ
अगर मैं गाँव का साधारण लड़का होता—
सुबह दूध लेने जाता,
दोपहर में मज़दूरी करता,
शाम को पत्नी के लिए नमक-तेल लाता,
और रात में
बिना किसी दार्शनिक तकलीफ़ के
सो जाता—
तो शायद
इतनी कविताएँ मेरे पीछे
कुत्तों की तरह नहीं पड़तीं।
लेकिन दुर्भाग्य यह है
कि मुझे
जीवन नहीं,
साहित्य ने पाला।
और साहित्य
अक्सर आदमी को
मनुष्य कम,
घायल जानवर ज़्यादा बना देता है।
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