प्रेम की पगडंडी - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'जानिब'

प्रेम की पगडंडी - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव | Hindi Kavita - Prem Ki Pagdandi
चलो आज फिर एक पगडंडी चुनें,
जहाँ पाँव से पहले दिल चल पड़ें।
जहाँ शब्द ना हों, बस नयन बोलते,
और चुप्पी में भी भाव छलक पड़ें।

छाँव जैसे तुम मेरी हर राह में,
मैं घने बादलों-सी तुम्हारी धूप में।
बाँध लें साँस को एक धुन की तरह,
जैसे सरगम सजी हो स्वरूप में।

न हो नाम कुछ इस मिलन का कहीं,
न हो गिनती कोई इन लम्हों की।
बस समय रुक जाए इसी मोड़ पर,
जहाँ धड़कन जुड़ी हो तुम्हारी मेरी।

कुछ कहो मत, बस यूँ ही साथ दो,
तुम्हीं जीवन की वह बात हो।
हर मोड़ पर हो तुम्हारा सहारा,
तुम ही स्नेह की सौग़ात हो।


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