साई अनमोल - अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
रे पागल मन, ठहर जा तू! - कविता - साई अनमोल
मंगलवार, अप्रैल 28, 2026
मेरे पागल मन! तू पागल मन!
ठहर जा तू! ठहर जा तू!
क्यों है चाह तेरी नव-जुड़ना?
क्यों है चाह तेरी अब मुड़ना?
रे क्यों अब भटक रहा तू!
ठहर जा तू! ठहर जा तू!
हाँ अब भटक रहा तू
उन अनन्त की राहों से,
चला आ रहा तू अब तक;
अब नई यह कैसी इच्छा?
क्यों रख रहा इतनी अपेक्षा?
मिल पाएगा क्या वह सब-
जिसको था तू हुआ बावला–
हुआ बावला रहा रचा तू!
ठहर जा तू! ठहर जा तू!
अरे मिथक वो सारा सपना–
अरे मिथक जो लगा था अपना
शून्य-शून्य अब सब सूना!
फैलाकर अपने चितवन को
रहे थे जिसके भाव उमड़?
क्या वो पिघला? देख तू मन!
तू उजड़ा पर वो 'निश्छल जड़'?
अरे अभी संभल जा तू!
अरे अभी ठहर जा तू!
भूल न मन तू मेरे तू
कैसा यह पागलपन तेरा?
इतना न अपनत्व भी गहरा
दे जो बदल, पूरी परिभाषा–
एक लगाव की....
एक जुड़ाव की....!
मन तू मेरा शूल-सा है
भावुकमय भी, उर-फूल-सा है,
तुझपर कई उमड़े हैं भँवरें
पर पागल, सब वो न तेरे!
तेरे तो बस वो प्रखर कूल
जिस पर तुझे होना है शूल,
रहे सुसज्जित साथ से तेरे
प्राणों का पाटल-अमूल!
ओ देख तू मन! वो रवि-रश्मियाँ
उस अनन्त की अनन्त अर्चियाँ
कभी फूल-सा जिसमें उछला तू!
रे शूल-सा भी अब बन जा तू!
ठहर जा तू!
ठहर जा तू!
रे पागल मन, ठहर जा तू!
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