मोहित नेगी 'मुंतज़िर' - सौंराखाल, रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड)
अपने हिस्से का पहाड़ - कविता - मोहित नेगी 'मुंतज़िर'
रविवार, अप्रैल 26, 2026
अल्पायु में ब्याही गई
उनकी माऐं
उन्हें छोड़ने आई हैं सड़क तक।
सुबह की पहली बस से,
वे नवयुवा जा रहे हैं
रोज़गार की तलाश में
शहरों की ओर।
वे जा रहे हैं छोड़ कर
अपने चारों और के
ऊँचे पहाड़
गहरी नदियाँ
सर्पिलाकार पगडंडियाँ
उफनते गधेरे
सीलन भरी घाटियाँ
पिताओं के सीढ़ीदार खेत
मगर वे ले कर जा रहे हैं
अपने अंदर
अपने हिस्से का पहाड़
जब वे
दिनभर की थकन से
चूर होकर
लौटेंगे
अपने काम से
अपने किराए के कमरों की ओर
और निढाल होकर लेटेंगे अपने बिस्तर पर
तब बन्द करते ही आँखें
उन्हें नज़र आएगा
अपने हिस्से का पहाड़
उसके गगनचुंबी शिखर
उफनते गधेरे,
और ढलानों पर गीत गाती
घसियारिने
और फिर वे रो पड़ेंगे
उस घुप्प अंधेरे में
बहुत देर तक
और न जाने कब
उन गर्म आँसुओ की तपन से
वे खो जाएँगे
नींद के आग़ोश में
सुबह उठने पर वे फिर ढोएँगे
अपने हिस्से का पहाड़
काश! वे लौट पाएँ
वापस
अपनी जड़ों की ओर
अपने घरों की ओर
वरना वे किसी दिन
ढोते हुए मर जाएँगे
अपने हिस्से का पहाड़।
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