स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित'

स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित' | Hindi Kavita - stree - Sanjay Rajbhar Samit. स्त्री पर कविता
जेठ की दुपहरी में
एक नव यौवना
जिसके पीठ पर बंधा बच्चा है
सिर पर ईंटे
झुलसती हुई गर्म हवाएँ हैं,

एक स्त्री
कैसे झेल लेती है?

ऊपर से घूरती हुई
भठ्ठा मालिकों की हवसी नज़रें
शराबी पति की गाली, मारपीट

इस दुनिया में
धरती के बाद कोई सहनशील है
तो मात्र एक स्त्री है।


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