स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित'
सोमवार, अप्रैल 27, 2026
जेठ की दुपहरी में
एक नव यौवना
जिसके पीठ पर बंधा बच्चा है
सिर पर ईंटे
झुलसती हुई गर्म हवाएँ हैं,
एक स्त्री
कैसे झेल लेती है?
ऊपर से घूरती हुई
भठ्ठा मालिकों की हवसी नज़रें
शराबी पति की गाली, मारपीट
इस दुनिया में
धरती के बाद कोई सहनशील है
तो मात्र एक स्त्री है।
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