डॉ॰ सुनीता सिंह - बस्ती (उत्तर प्रदेश)
विरह का सौंदया - कविता - डॉ॰ सुनीता सिंह
सोमवार, मार्च 23, 2026
विरह केवल पीड़ा नहीं,
यह एक गहन साधना है,
जहाँ हर आँसू के भीतर,
प्रेम की ही कामना है।
तेरे जाने के पश्चात भी,
तू मुझमें ही बसा रहा,
हर सूनी-सी दोपहर में,
तेरा ही आभास रहा।
मन के रिक्त विस्तार में,
तेरे स्वर गूँजते रहते हैं,
जैसे सूखे पत्तों पर भी,
बरसातें बरसते रहते हैं।
कभी लगता है यह दूरी,
हमें और समीप लाती है,
तेरे अभाव की यह अनुभूति,
मुझे तुझमें ही समाती है।
विरह के इस सौंदर्य में,
एक मधुर-सी वेदना है,
जो टूटकर भी हर क्षण,
प्रेम की ही साधना है।
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