विरह का सौंदया - कविता - डॉ॰ सुनीता सिंह

विरह का सौंदया - कविता - डॉ॰ सुनीता सिंह | Hindi Kavita - virah ka saundrya- Dr Sunita Singh
विरह केवल पीड़ा नहीं,
यह एक गहन साधना है,
जहाँ हर आँसू के भीतर,
प्रेम की ही कामना है।
तेरे जाने के पश्चात भी,
तू मुझमें ही बसा रहा,
हर सूनी-सी दोपहर में,
तेरा ही आभास रहा।
मन के रिक्त विस्तार में,
तेरे स्वर गूँजते रहते हैं,
जैसे सूखे पत्तों पर भी,
बरसातें बरसते रहते हैं।
कभी लगता है यह दूरी,
हमें और समीप लाती है,
तेरे अभाव की यह अनुभूति,
मुझे तुझमें ही समाती है।
विरह के इस सौंदर्य में,
एक मधुर-सी वेदना है,
जो टूटकर भी हर क्षण,
प्रेम की ही साधना है।

डॉ॰ सुनीता सिंह - बस्ती (उत्तर प्रदेश

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