माशूका- कविता - प्रवीन 'पथिक'
सोमवार, मार्च 23, 2026
बशर यूँ किसी से
बेइंतहा मोहब्बत करता है।
जिसके ख़्यालों में,
शाम-ओ-सहर;
जिसे पाने की चाहत में
ताउम्र गुज़ार देता है।
फ़कत इतनी आरज़ू रहती,
रहे जहाँ में, हमराह साथ रहे।
वह शख़्स
अपनी हर ख़्वाहिशें, सारे जज़्बात
अपनी माशूका पर वार देता है।
उसका ज़र्रा-ज़र्रा
उसके ख़्वाब में डूबा रहता है।
और दिलशाद रहता है।
वह हर अलाम सह सकता है;
सिवाय
महबूब के ख़फ़ा होने,
वा उसके अलैहिदा होने के।
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