बदनाम गलियाॅं - कविता - संजय राजभर 'समित'
रविवार, नवंबर 03, 2024
हम बदनाम हैं
ठिकाना है बदनाम गलियाॅं
क्योंकि हम ग़रीब हैं
आप बड़े लोग हैं
कुछ शब्द बना लिए हैं
"ख़ुश करो"
"डेट"
"डिनर पर चलते हैं"
"आज ऑफ़िस में काम ज़्यादा है"
पर डिमांड और आपूर्ति
हमारा और आप बड़े लोगों की एक ही है।
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