ऋचा सिंह - गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
तो ज़िंदगी है - कविता - ऋचा सिंह
गुरुवार, जनवरी 18, 2024
धूप में
खोजे है छाँव,
छाँव में गुमसुम-सी है
ये अनमनी जो है
तो ज़िंदगी है।
रात में करवट जो बदले
भोर भए उम्मीद-सी है,
ये आस जो है
तो ज़िंदगी है।
सताए अतीत
भविष्य साँझ दुपहर,
ये फ़िक्र जो है
तो ज़िंदगी है।
अधूरा-सा है
जितना भी पा लो,
ये बेचैनी जो है
तो ज़िंदगी है।
उलझा है
हर धागा सोच का,
चुनर आँसुओं से है बोझल
ये उलझन जो है
तो ज़िंदगी है।
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