प्रेम - कविता - गणेश दत्त जोशी

सोचा भी नहीं न देखा है,
मिला भी नहीं पर कोई गिला भी नहीं है,
हाँ सच तो यही है वो जैसा भी है मेरा ही तो है।
मेरे रोम-रोम में, मन के विस्तृत व्योम में,
भावनाओं के सघन वन में गुम सा मैं, साथ में केवल वही तो है।
वही राज़ है जीवन का साज है,
उसी पर अडिग हूँ मैं, वहीं टूटती साँसों का अटूट तार है,
वो है तो धरा पर धरे हैं पग मैंने, वही स्वर्ग की स्वर्णिम सैर है। 

गणेश दत्त जोशी - वागेश्वर (उत्तराखंड)

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