गोलेंद्र पटेल - चंदौली (उत्तर प्रदेश)
उषा - कविता - गोलेन्द्र पटेल
मंगलवार, दिसंबर 20, 2022
प्रात पुष्प था बहुत खिला हुआ जैसे
लोहित आसमान का सूरज
पृथ्वी पर उतर रहा हो
(नदी सागर की यात्रा में नई सुबह है)
बहुत धुआँ उठ रहा है उधर
कि जैसे जंगल जल रहा हो
काग़ज़ पर या समय के श्यामपट पर
लिख दी हो किसी ने
कुम्हलाई कली की करुणा
रूह की रोशनाई से
और देह
दर्द का गेह मालूम हो रही है
गौर रेह रो रही है
रेत...
फ़सलें झुमती हैं रेगिस्तान में उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।
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