गुरु - कविता - अर्चना मिश्रा

गुरु वो हैं जो ग़ुरूर से दूर हैं,
हो मुश्किल कितना भी रास्ता 
देते हल ज़रूर हैं।
जो भी मेरी लेखनी की चाल हैं,
सब गुरु का ही तो कमाल हैं।
एक-एक भाव एक-एक छंद जो भी
आज गढ़ा हैं, सब गुरु से ही मिला हैं।
वो कच्ची उमर के पक्के रिश्ते,
जो हम गिरते, तो गुरु पकड़ते।
उनकी महिमा अपरम्पार हैं।
रहा कोई भी तरीक़ा उनका 
मेरे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ गया,
मेरा रिश्ता मेरे गुरु से हैं घनिष्ठ बड़ा,
आज भी स्मरण में हैं उनका हँसमुख चित्र बड़ा।
एक-एक सीख हैं याद मुझको ज़बानी,
जो बाक़ी अभी हैं सबको बतानी।
जो तुम होते ना गुरुवर तो मार्ग दिखाता कौन?
इस अंधेरे स्याह से सुर्ख़ राह को पार कराता कौन।
मैं तो बच्चा हूँ अज्ञानी हूँ,
नादान हूँ नासमझ हूँ,
जो भी राह दिखाओगे
नतमस्तक होके मानेंगे,
में तो आज भी वही छोटा सी शिष्या हूँ,
आप आज भी वही मेरे प्रिय गुरु हैं।

अर्चना मिश्रा - दिल्ली

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