राष्ट्रधर्म - कविता - गोकुल कोठारी

धर्म एक हो अपना,एक हो अपना नारा,
सब धर्मों से बढ़कर देश हमें हो प्यारा।
इस देश के ख़ातिर जिसने थी तन की क़ुर्बानी,
चलो उनके पदचिन्हों पर नहीं व्यर्थ करो ये जवानी।
बस याद उन्हीं की रहती, देश के काम जो आया,
छोटी सी बातों पर करते ख़ुद को क्यों जाया।
वीर शिवा और राणा की ये पुष्य प्रसूता धरती,
जिनके बलिदानों पर दुनिया आहें भरती।
तन मन से एका कर लो, अगर एक भी टूटा,
वीर भगत उस दिन हो जाएगा झूठा।
उनकी लाज धरो तुम जो देश पर मिटते हैं,
ख़ुद मिट जाते लेकिन महफ़ूज़ वतन करते हैं।
जब भी संकट गहराए, ऐ! साहिल कश्ती खेना,
हम हिंद के हिंदूस्तानी, जग को संदेशा देना।
मिटा है तेरे लिए जो, तेरी जाति धर्म न जाना,
उसकी शर्म करो कुछ, वो भी तो किसी का अपना,
इस देश के ख़ातिर जिसने दी थी तन की क़ुर्बानी।
शिखर हिमालय पर जब राष्ट्र ध्वज लहराता,
महसूस करो वो गौरव, जो आँखों से बह जाता।
हो कोई भूला पथ में तो राह उसे दिखलाना,
जो मन में तनिक कलुष हो तो दीप बन जल जाना।

गोकुल कोठारी - पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)

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