सुनो कुछ कहना है - कविता - मेहा अनमोल दुबे

सुनो कुछ
कहना है–
ज़िंदगी कभी आसान नहीं होती,
आसान बनाना पड़ता है, 
कभी-कभी बेवजह भी गुनगुनाना पड़ता है,
ख़्वाहिश ज़रूर पूरी करो 
पर जीना मत छोड़ों, 

घुटन ज़िंदगी नहीं, 
तड़प भी नहीं, 

जो जी लिया, वो, दोबारा नही मिल सकता,
जो छुट गया, वो, फिर नहीं आ सकता,
कभी-कभी बेवजह भी दिल हल्का कर लिया करो, 
कभी रोकर, 
कभी हँसकर, 
ग़ुबार 
निकाल लिया करो, 
ज़िम्मेदारी सबकी है, पर
ख़ुद की ख़ुद पर सबसे ज़्यादा है,  
औरों का तो ठिक है ,
पर ख़ुद को ख़ुश रखने का भी वादा है, 
किसी को, जवाब मत दो, 
किसी के सवालों मे मत उलझों, 

यूँ उदासी ओढ़ के न घुमा करो दोस्त,
मुस्कुराते ज्यादा अच्छे लगते हो, 
कभी-कभी ग़लत सही से अलग हट कर सोचो,
कभी-कभी सुलझने और उलझनों के मध्य से सोचो,
मुस्कान से नीचे चलेगा, पर आँसुओं के ऊपर सोचो,
जब भी सोचो इंसानी आयामों से सोचो, 
प्रेम से नीचे पर, नफ़रत से ऊपर सोचो,
जितना भी सोचो, अच्छा सोचो,
छोटी-छोटी बातों को मत सोचो,
जिसको जो करना था ना, वो कर के जा चुका है,  
जिसको जो करना है वो, वो करके रहेगा,
 तुम ना!! इससे थोड़ा अलग सोचो, 
जो बस में नहीं उससे कम, और जो बस में है, उसके ऊपर सोचो,
सुनो ना! ये इंसानी फ़ितरत है, 
थोडा ख़ुश रहकर ही बदलेगी,
जितना भी जियो, भरपुर जियो,
दिखावे की, दिखाने की, 
बात छोड़कर जियो, 
सिर्फ़  सुकून दे जो तुम्हे, ऐसे लम्हो को जियो,
और हाँ,   
कभी, सुकून भरी
चाय, पीने कि इच्छा हो तो, 
याद कर लेना।

मेहा अनमोल दुबे - उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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