राघवेन्द्र सिंह - लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
तू जीवन की वो स्मृति है - कविता - राघवेंद्र सिंह
सोमवार, मार्च 07, 2022
तू जीवन की वो स्मृति है
जिसकी विस्मृति भी स्मृति है।
इन नयनों के सजल सिंधु में
तू ही सुंदर सरल कृति है।
दृग जल तेरे अनुयायी हैं
तू ही इनकी प्रत्याशा है।
प्राण पुलक की बंधी डोर तू
तू ही इनकी परिभाषा है।
अर्द्ध रात्रि स्वप्निल बेला में
सहसा मन में तू आती।
मेरे द्रवित हृदय में तू ही
मलय पवन बन छा जाती।
तेरा हर स्वर चित्रहार है
और तेरा है प्रेम शाश्वत।
श्वासों का चलना भी तुझसे
तू ही है रोली-अक्षत।
अधर हुए हैं मौन किन्तु यह
मन मेरा विक्षिप्त नहीं।
मन स्मृतियों को ढूँढ़े ये
विस्मृतियों में लिप्त नहीं।
तेरा आना जाना तय था
किन्तु तेरी छवि ही अनुकृति है।
तू जीवन की वो स्मृति है
जिसकी विस्मृति भी स्मृति है।
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