गणतंत्र दिवस - कविता - सीमा वर्णिका

गणतंत्र दिवस का हुआ आगमन,
गूँजायमान हुए धरती और गगन।
कोहरे की सर्द चादर सिमट गई,
बहने लगी सुखमयी बसंती पवन।

भारतवर्ष ने बहत्तर वर्ष पूर्व आज,
गणराज्य का धारण करा था ताज।
देश का अपना संविधान हुआ लागू,
ब्रिटिश शासकों पर गिरी थी गाज।

देश में जब लागू हुआ था गणतंत्र,
लोकतंत्र का मिला जनता को मंत्र।
संप्रभुता धर्मनिरपेक्षता भाव लिए,
चँहुओर सर्वमान्य हुआ था जनतंत्र।

छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास,
ऐतिहासिक क्षण था मचा उल्लास।
इरविन स्टेडियम में झंडा फहरा कर,
तत्कालीन राष्ट्रपति ने रचा इतिहास।

प्रतिवर्ष भव्य समारोह देश मनाता,
राजपथ पर राष्ट्रपति झंडा फहराता।
पारंपरिक तथा सांस्कृतिक झाँकियाँ,
सेना शस्त्र प्रदर्शन राष्ट्र गौरव बढ़ाता।

लड़ाकू विमान अजब करतब दिखाते,
आसमान में तिरंगे की छवि बनाते।
जल, थल और नौसेना तीनों मिलकर,
सैन्यबल स्वातंत्र्य की अनुभूति कराते।

शहीद ज्योति पर राष्ट्रपति नमन करते,
शहीदों को श्रद्धांजलि पुष्पादि चढ़ते।
विदेशी मेहमान इस समारोह में आते,
आवभगत से विदेशी संबंध सुधरते।

हिमालय से कन्याकुमारी की जनता,
पावन राष्ट्रीय पर्व सबके यहाँ मनता।
देशप्रेम लहर से ओतप्रोत धरा हर्षित, 
समरंग में देश रंगा नहीं असमानता।।

सीमा वर्णिका - कानपुर (उत्तर प्रदेश)

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