वास्तविक जीवन - कविता - खैलेश सन्नाडय

मैंने परित्याग कर दिया है वो सारे कर्म,
जिसका क्रियान्वयन तुम्हें अच्छा लगता है।
मैं सम्मान करता हूँ उन सभी जीव-जंतुओं का,
जो तुम्हारे नेत्रों के सामने बच्चा लगता है।
मैं कैसे और क्यों घमंड करूँ...?
धन, भूमि, सुंदरता ये सब मुझे कच्चा लगता है।
ईश्वर ही सत्य है बाक़ी सब मिथ्या,
उसी का दास हूँ वो ही तो एकमात्र मुझे सच्चा लगता है।
आत्मा आरूढ़ है रथ पर, बुद्धि है सारथी, मन है लगाम, इंद्रियाँ है घोड़े।
यदि नहीं रखेगा स्वयं पर नियंत्रण भटकेगा बंदे भौतिकता में दौड़े-दौड़े।
इन्द्रियों की संतुष्टि के लिए इस जगत में हर काज होता है, ये अपने विषयों में लीन होने के लिए आगे बढ़ता है तथा अपना आपा खोता है।
जन्म मिलता है, बढ़ते हैं, बुद्धिजीवी लोगों के भीतर एक प्रश्न उठता है।
आख़िर कौन हूँ मैं तथा कौन से उद्देश्य से आया हूँ? बारम्बार यही सोचता व पुछता है।
प्रयास करता है... भौतिक साहित्यों में इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ता है।
परंतु भौतिक प्रकृति तथा इसकी हर वस्तु केवल एक माया है,
वास्तविक व मूल ज्ञान किसी को समझ नहीं आया है।
क्यों भटक रहे हो इस भवसागर में केवल एक बार अध्ययन करलो श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप,
तत्पश्चात समझ जाओगे स्वयं का भी स्वरूप।

खैलेश सन्नाडय - बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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