डॉ॰ राजेश पुरोहित - भवानीमंडी, झालावाड़ (राजस्थान)
पतंग - बाल कविता - डॉ॰ राजेश पुरोहित
सोमवार, दिसंबर 27, 2021
आदमी की ज़िंदगी पतंग सी
कभी रंग बिरंगी चमकती,
डोर कट जाए रिश्तों की तो
न जाने कहाँ-कहाँ भटकती।
लक्ष्य को पाने ऊँचाइयाँ छू लेती
कभी हिचकोले खाती खाती,
मगर कोई टाँग खींचता तो
पल में झट से धरती पर टपकती।
पतंग के रफ़्तार सी होती ज़िंदगी
क्या-क्या न सह लेती है ज़िंदगी,
हाथों में डोर रह जाती बुज़ुर्गों के
पर न जाने कहाँ ले जाती ज़िंदगी।
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